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Farmers Wave Goodbye: देश के वो पांच आंदोलन, जिन्होंने देश को हमेशा के लिए बदल दिया, सरकारें भी हिलीं

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Sat, 11 Dec 2021 04:58 PM IST

सार

पहले भी कई बार ऐसा हुआ है जब लोग बड़ी संख्या में एक अन्याय का विरोध करने या किसी मुद्दे का समर्थन करने के लिए एक साथ आए हैं। इन आंदोलनों से न केवल इतिहास रचे गए बल्कि सरकारें भी हिलीं। किसान आंदोलन ने भी अपनी जिजीविषा, इरादों और प्रभावों को लेकर देश दुनिया में सबका ध्यान खींचा
 
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चिपको आंदोलन
पिछले एक साल से चला आ रहा किसान आंदोलन अब घर वापसी तक पहुंच गया है। तीन विवादस्पद कृषि कानूनों की वापसी और अन्य मांगों पर केंद्र से मिली सहमति के बाद से किसानों ने फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है। दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर डटे किसानों की अब घर वापसी शुरू हो गई है।

जानकार इसे सबसे लंबा चलने वाला जन आंदोलन बताते हैं जिसने अपनी जिजीविषा, इरादों और प्रभावों को लेकर देश दुनिया में सबका ध्यान खींचा। इस तरह के नागरिक आंदोलन हमारे देश के लिए नए नहीं हैं। अतीत में, देश ने कुछ सबसे शक्तिशाली जन आंदोलनों को देखा है जिसके कारण कुछ ऐतिहासिक निर्णय हुए और पूरा देश एक साथ खड़ा हुआ। ऐसे ही कुछ पांच महत्वपूर्ण आंदोलनों के बारे में पढ़िए ये रिपोर्ट 


चिपको आंदोलन – 1973
गांधीवादी सिद्धांतों के आधार पर, जंगलों से पेड़ों को काटने के लिए चिपको आंदोलन शुरू हुआ। यह एक अहिंसक आंदोलन था जो साल 1973 में हुआ था। 1970 से उत्तराखंड के चमोली जिले  सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में पेड़ों को काटने का विरोध चल रहा था। चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जब ठेकेदार पेड़ों को काटने पहुंचे तो आंदोलन में शामिल महिलाएं और पुरुष पेड़ों से लिपट जाते थे और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था।  

महिलाओं का एक समूह पेड़ों को काटने का विरोध कर रहा है,  यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। देश में इस आंदोलन के समर्थन में लोग उतर आए। केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया।  कहा जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था। इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 साल के लिए रोक लगाई गई।  
 
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चिपको आंदोलन
पिछले एक साल से चला आ रहा किसान आंदोलन अब घर वापसी तक पहुंच गया है। तीन विवादस्पद कृषि कानूनों की वापसी और अन्य मांगों पर केंद्र से मिली सहमति के बाद से किसानों ने फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है। दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर डटे किसानों की अब घर वापसी शुरू हो गई है।

जानकार इसे सबसे लंबा चलने वाला जन आंदोलन बताते हैं जिसने अपनी जिजीविषा, इरादों और प्रभावों को लेकर देश दुनिया में सबका ध्यान खींचा। इस तरह के नागरिक आंदोलन हमारे देश के लिए नए नहीं हैं। अतीत में, देश ने कुछ सबसे शक्तिशाली जन आंदोलनों को देखा है जिसके कारण कुछ ऐतिहासिक निर्णय हुए और पूरा देश एक साथ खड़ा हुआ। ऐसे ही कुछ पांच महत्वपूर्ण आंदोलनों के बारे में पढ़िए ये रिपोर्ट 

चिपको आंदोलन – 1973
गांधीवादी सिद्धांतों के आधार पर, जंगलों से पेड़ों को काटने के लिए चिपको आंदोलन शुरू हुआ। यह एक अहिंसक आंदोलन था जो साल 1973 में हुआ था। 1970 से उत्तराखंड के चमोली जिले  सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में पेड़ों को काटने का विरोध चल रहा था। चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जब ठेकेदार पेड़ों को काटने पहुंचे तो आंदोलन में शामिल महिलाएं और पुरुष पेड़ों से लिपट जाते थे और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था।  

महिलाओं का एक समूह पेड़ों को काटने का विरोध कर रहा है,  यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। देश में इस आंदोलन के समर्थन में लोग उतर आए। केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया।  कहा जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था। इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 साल के लिए रोक लगाई गई।  
 

जयप्रकाश नारायण (फाइल फोटो) - फोटो : फाइल फोटो
2. संपूर्ण क्रांति 1974
18 मार्च 1974 को बिहार से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन की नींव पड़ी थी। आंदोलन बिहार सरकार के अन्दर मौजूद भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ। 1974 में गुजरात के एलडी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने बढ़ती फीस और महंगाई का विरोध करना शुरू किया जो आगे चलकर नवनिर्माण आंदोलन में बदल गया। वहां के छात्रों ने जयप्रकाश नारायण से इस आंदोलन की अगुवाई करने को कहा जिसके लिए वे तैयार हो गए।

शुरू में जेपी ने भ्रष्टाचार के विषय को लेकर इस आंदोलन को शुरू किया लेकिन धीरे-धीरे इस आंदोलन में कई विषय जैसे सामाजिक न्याय, जाति व्यवस्था तोड़ने, जनेऊ हटाने, नर-नारी समानता, शासन, प्रशासन का तरीका बदलने और राइट टू रिकॉल जैसे विषय शामिल कर लिए गए। जेपी को देश भर के लोगों का अपार जनसर्थन मिला। पांच जून 1974 के दिन पटना के गांधी मैदान में औपचारिक रूप से संपूर्ण क्रांति की घोषणा हुई थी। इस क्रांति का मतलब परिवर्तन, नवनिर्माण, इंदिरा गांधी की सरकार को हटाना और राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव करना था।

जेपी ने बिहार से निकलकर आंदोलन को देशव्यापी बनाने और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस और इंदिरा गांधी को घेरने का फैसला किया। यह आंदोलन पूरे देश में ऐसा फैल गया कि देखते ही देखते भारतीय राजनीति की शक्ल बदल गई। इस आंदोलन के बाद देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की नागरिक चेतना का विकास हुआ। हालांकि इसी आंदोलन की वजह से देश को लोकतंत्र का सबसे काला समय यानी 'आपातकाल' का सामना करना पड़ा।  

मेधा पाटकर - फोटो : twitter
3.नर्मदा बचाओ आंदोलन- 1985
नर्मदा नदी के पास बड़ी संख्या में बांधों के बनने से लोगों को विस्थापित किए जाने के खिलाफ आदिवासियों, किसानों, पर्यावरणविदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने यह आंदोलन शुरू किया।  इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी 1985 का जब मेधा पाटकर ने डॉ. मुरलीधर देवीदास आमटे, जिन्हें लोग बाबा आमटे के नाम से जानते हैं उनके साथ मिलकर मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव, चिखलदा से इस आंदोलन को शुरू किया। प्रभावित गांव के करीब ढाई लोख लोगों ने पुनर्वास का मुद्दा उठाया था और भूख आंदोलन का भी सहारा लिया गया। इस आंदोलन ने सरकार और समाज को मजबूर किया कि वह देश में विकास की परिभाषा पर दोबारा विचार करे।

अन्ना हजारे - फोटो : अमर उजाला
4.जन लोकपाल विधेयक, अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन- 2011
जब भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने पांच अप्रैल, 2011 को नई दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की, तो पूरा देश एक साथ आया और उनके साथ खड़ा हुआ। आंदोलन के कारण कृषि मंत्री शरद पवार को मंत्रियों के समूह से इस्तीफा देना पड़ा। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग साथ आए और दिल्ली के रामलीला मैदान में यह आंदोलन चला। इस आंदोलन दशकों में अपनी तरह का एक अनूठा आयोजन बन गया। यह उन दुर्लभ घटनाओं में से एक थी जिसने यह साबित किया कि अगर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र जाग जाए तो क्या नहीं संभव है।

टाइम मैगजीन ने इस आंदोलन को 2011 की शीर्ष 10 समाचारों में शामिल किया। इस आंदोलन के बाद ही आम आदमी पार्टी का उदय हुआ और अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने दिल्ली में अपनी सरकार बनाई। माना जाता है कि इसी आंदोलन की वजह से केंद्र से यूपीए सरकार की विदाई हुई। अन्ना आंदोलन के बाद जन लोकपाल कानून साल 2014 से लागू है। 

निर्भया की मां (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
निर्भया आंदोलन - 2012
16 दिसंबर 2012 दिल्ली में एक मेडिकल की छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना से लोग बहुत गुस्से में थे। लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। घटना के बाद देश के कई हिस्सों में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और विरोध प्रदर्शन किया। इस आंदोलन ने सोशल मीडिया में भी हलचल पैदा कर दी। हजारों लोगों ने इस घटना के विरोध में एक याचिका पर हस्ताक्षर किए। आंदोलन को ध्यान में रखते हुए केंद्र और विभिन्न राज्यों की सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई कदमों की घोषणा की। इसी आंदलोन की बदौलत केंद्र सरकार ने महिलाओँ के सुरक्षा के लिए बने कानून में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए। 
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