पिछले एक साल से चला आ रहा किसान आंदोलन अब घर वापसी तक पहुंच गया है। तीन विवादस्पद कृषि कानूनों की वापसी और अन्य मांगों पर केंद्र से मिली सहमति के बाद से किसानों ने फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित कर दिया है। दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर डटे किसानों की अब घर वापसी शुरू हो गई है।
जानकार इसे सबसे लंबा चलने वाला जन आंदोलन बताते हैं जिसने अपनी जिजीविषा, इरादों और प्रभावों को लेकर देश दुनिया में सबका ध्यान खींचा। इस तरह के नागरिक आंदोलन हमारे देश के लिए नए नहीं हैं। अतीत में, देश ने कुछ सबसे शक्तिशाली जन आंदोलनों को देखा है जिसके कारण कुछ ऐतिहासिक निर्णय हुए और पूरा देश एक साथ खड़ा हुआ।
ऐसे ही कुछ पांच महत्वपूर्ण आंदोलनों के बारे में पढ़िए ये रिपोर्ट
चिपको आंदोलन – 1973
गांधीवादी सिद्धांतों के आधार पर, जंगलों से पेड़ों को काटने के लिए चिपको आंदोलन शुरू हुआ। यह एक अहिंसक आंदोलन था जो साल 1973 में हुआ था। 1970 से उत्तराखंड के चमोली जिले सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में पेड़ों को काटने का विरोध चल रहा था। चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जब ठेकेदार पेड़ों को काटने पहुंचे तो आंदोलन में शामिल महिलाएं और पुरुष पेड़ों से लिपट जाते थे और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था।
महिलाओं का एक समूह पेड़ों को काटने का विरोध कर रहा है, यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। देश में इस आंदोलन के समर्थन में लोग उतर आए। केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया। कहा जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था। इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 साल के लिए रोक लगाई गई।