केंद्र सरकार के रवैये को लेकर किसान नेताओं में खासी नाराज़गी नजर आने लगी है और वे अब सरकार को खुदगर्ज तक कह रहे हैं। भले ही चार जनवरी को एक बार फिर वार्ता होनी है, लेकिन उसका नतीजा सार्थक निकलेगा, ऐसी उम्मीद कम ही नजर आती है।
एआईकेएससीसी के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, सरकार इस तलाश में है कि कोई दुर्घटना हो और किसान आंदोलन खत्म हो जाए। मतलब प्राकृतिक आपदा, कोई बीमारी या मानव जनित दुर्घटना आदि हो जाए तो सरकार की बात बन सकती है। यानी उसकी आड़ में केंद्र सरकार, किसान आंदोलन को खत्म करा देगी। सरकार को किसानों की दिक्कतों से कोई मतलब नहीं है। वह रोजाना केवल इतना देख रही है कि किसान आंदोलन मजबूत हो रहा है या कमजोर पड़ने लगा है। आंदोलन स्थल पर किसानों की संख्या बढ़ी या घटी है।
अविक साहा ने बताया, किसान आंदोलन अभी तक धैर्य पर चलता आ रहा है। अमूमन इतने लंबे आंदोलन में धैर्य को तोड़ने यानी आंदोलनकर्ताओं को उकसाने का हर संभव प्रयास किया जाता है, मगर दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों ने सरकार के इस भ्रम को तोड़ दिया है। कहीं कोई अशांति वाली बात नहीं हुई।
सरकार के साथ अभी तक जितनी भी बैठकें हुई हैं उन सभी में किसान संगठनों ने नए कृषि कानूनों को वापस लेने की बात कही है। सात दौर की बैठकों के बाद सरकार ने एक बार भी यह नहीं कहा कि हम कानून वापस लेने पर विचार करेंगे। उल्टा यह होता है कि जब बैठक होनी होती है, उससे एक दो दिन पहले केंद्रीय मंत्री अपने साक्षात्कार या मीडिया बाइट के जरिए ये मंशा जाहिर कर देते हैं कि सरकार झुकेगी नहीं। किसानों को बहकाया जा रहा है। कृषि कानून वापस नहीं होंगे।
केंद्र सरकार सोच रही थी कि कुछ लोगों का मामला है, निपटा देंगे। आंदोलन शुरू होने के बाद सरकार को यह लगने लगा कि ये मामला तो बड़ा हो गया है। बतौर साहा, हमारा कहना है कि ये हर किसान का मसला है। किसान का संबंध खाने से है, इसलिए सरकार को इस मामले में गंभीरता दिखानी चाहिए थी।
सरकार, खुले बाजार की पक्षधर है, जबकि सच्चाई यह है कि खुला बाजार भूख के साथ नहीं चलता है। सरकार जानती है कि कृषि कानूनों में संशोधन संभव नहीं है। इन्हें तो रद्द करना ही पड़ेगा। मौजूदा स्थिति में किसान को गारंटी चाहिए, लेकिन सरकार वह देने को तैयार नहीं है। वजह, सरकार को खुले बाजार के व्यापारियों की चिंता है।
अगर उसे किसानों के हितों का ख्याल होता तो अभी तक कानून रद्द हो चुके होते। किसान इस आंदोलन में हार जाए, यह बात दिमाग में रखकर केंद्र सरकार आगे बढ़ रही है। साहा के अनुसार, हमें पूरा यकीन है कि चार जनवरी की बैठक में भी सरकार, कृषि कानूनों को रद्द करने जैसी कोई बात नहीं कहेगी।