उच्चतम न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन को देखते हुए केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को बड़ा झटका दिया है। शीर्षस्थ अदालत ने इस मामले के समाधान तक तीनों कृषि कानूनों को लागू करने पर रोक लगा दी है। अदालत ने मामले के तर्कसंगत समाधान की दिशा में कदम उठाते हुए चार सदस्यीय समिति का गठन किया है, लेकिन उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से किसान संगठन और किसानी मामलों के विशेषज्ञ सहमत नहीं है।
किसान मामलों के विशेषज्ञ चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह को भी कमेटी के नामों पर हैरत हो रही है। चौधरी का कहना है कि आखिर पांच मिनट में कैसे उच्तम न्यायालय ने ये नाम तय कर दिए। किसने शीर्षस्थ अदालत को ये नाम दिए? चौधरी का कहना है कि चारों लोग तो पहले से ही तीनों कानूनों का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। फिर इसमें किसान की आवाज कैसे आ सकेगी? पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि यह तो कमेटी के नाम किसानों के साथ धोखा हो रहा है।
उन्होंने कहा कि यह भी बात समझ में नहीं आई कि किसानों को प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान जैसे स्थान देने के मामले में दिल्ली पुलिस कमिश्नर निर्णय लेंगे। चौधरी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। ऐसा न हुआ तो लोगों का न्यायपालिका से भरोसा उठने लगेगा।
उच्चतम न्यायालय द्वारा कानूनों को लागू करने पर रोक लगाने और चार सदस्यीय कमेटी बनाने से क्या किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा? इसके जवाब में भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत कहते हैं कि तीनों कानूनों के रद्द होने तक किसान आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि अभी हमने, किसान संगठनों ने शीर्षस्थ अदालत का फैसला नहीं पढ़ा है। इसे पढ़कर किसान नेता आगे की रणनीति पर विचार करेंगे, लेकिन एक बात साफ है कि यह आंदोलन हमारी (किसानों की) मांग पूरी होने तक जारी रहेगा।