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किसान आंदोलन पार्ट 2: क्या है किसानों की आगे की रणनीति, सरकार के सामने रास्ता क्या?

प्रतिभा ज्योति
Updated Sat, 27 Nov 2021 01:33 PM IST

सार

देश के करीब 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधि समूह एसकेएम का कहना है कि किसानों की महत्वपूर्ण मांग अब भी पूरी नहीं हुई है। एसकेएम ने हाल ही में पीएम को लिखे अपने खुले पत्र में कहा, "यह (एमएसपी) महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सभी किसानों को उनकी उपज के लिए कम से कम न्यूनतम मूल्य का आश्वासन मिलता है।"
 
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किसान आंदोलन - फोटो : Amar Ujala

पिछले शुक्रवार को पीएम मोदी ने तीनों विवादस्पद कानून खत्म करने का बड़ा एलान किया। केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में भी तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के विधेयक को मंजूरी दे दी गई है। अब सोमवार से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में  पहले दिन ही इस विधेयक को पेश किया जाएगा। विधेयक पर संसद में बहस होगी और इसके बाद वोटिंग होगी। विधेयक पास होते ही तीनों कृषि कानून रद्द हो जाएंगे। लेकिन तीनों कृषि कानून रद्द किए जाने के सरकार के इन कदमों के बावजूद किसान अभी भी आंदोलन खत्म करने के पक्ष में नहीं है।

सिंघू, गाजीपुर और टिकरी बॉर्डरों पर इकट्ठा हैं किसान
किसानों का कहना है कि जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गारंटी कानून नहीं बनाया जाता तब तक वे अपने घर जाने को तैयार नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि बीते साल 26-27 नवंबर को ही दिल्ली चलो के आह्वान से यह आंदोलन शुरू हुआ था। ऐसे में किसान आंदोलन ने एक साल का ऐतिहासिक समय पूरा कर लिया है।



इस मौके पर शुक्रवार को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के हजारों किसान बड़ी संख्या में सिंघू, गाजीपुर और टिकरी बॉर्डरों पर इकट्ठा हुए थे और वहां डटे हुए हैं। हालांकि सरकार ने एक बार फिर उनसे आंदोलन खत्म करने की अपील की है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा  कि पीएम ने एमएसपी पर समिति बनाने की घोषणा की है। किसानों को अब आंदोलन खत्म कर देना चाहिए। सरकार ने पराली जलाने को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की किसानों की मांग भी मान ली है।

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किसान आंदोलन - फोटो : Amar Ujala
पिछले शुक्रवार को पीएम मोदी ने तीनों विवादस्पद कानून खत्म करने का बड़ा एलान किया। केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में भी तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के विधेयक को मंजूरी दे दी गई है। अब सोमवार से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में  पहले दिन ही इस विधेयक को पेश किया जाएगा। विधेयक पर संसद में बहस होगी और इसके बाद वोटिंग होगी। विधेयक पास होते ही तीनों कृषि कानून रद्द हो जाएंगे। लेकिन तीनों कृषि कानून रद्द किए जाने के सरकार के इन कदमों के बावजूद किसान अभी भी आंदोलन खत्म करने के पक्ष में नहीं है।

सिंघू, गाजीपुर और टिकरी बॉर्डरों पर इकट्ठा हैं किसान
किसानों का कहना है कि जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गारंटी कानून नहीं बनाया जाता तब तक वे अपने घर जाने को तैयार नहीं है। संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि बीते साल 26-27 नवंबर को ही दिल्ली चलो के आह्वान से यह आंदोलन शुरू हुआ था। ऐसे में किसान आंदोलन ने एक साल का ऐतिहासिक समय पूरा कर लिया है।

इस मौके पर शुक्रवार को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के हजारों किसान बड़ी संख्या में सिंघू, गाजीपुर और टिकरी बॉर्डरों पर इकट्ठा हुए थे और वहां डटे हुए हैं। हालांकि सरकार ने एक बार फिर उनसे आंदोलन खत्म करने की अपील की है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा  कि पीएम ने एमएसपी पर समिति बनाने की घोषणा की है। किसानों को अब आंदोलन खत्म कर देना चाहिए। सरकार ने पराली जलाने को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की किसानों की मांग भी मान ली है।

ट्रैक्टर रैली के दौरान किसान (पाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
किसान अपने रुख पर अड़े
सरकार की अपील के बाद भी किसान एमएसपी पर गारंटी कानून की अपनी मांग को लेकर अड़े हैं। किसान सिंघू और गाजीपुर बार्डर पर बैठे हुए हैं। सरकार पर दबाव बनाने के लिए दिल्ली में विभिन्न मोर्चों पर फिर से हजारों किसानों का पहुंचना शुरू हो गया है। शुक्रवार को भी अच्छी खासी संख्या में किसान ट्रैक्टर ट्रालियों के साथ साथ कारों आदि से दिल्ली की ओर पहुंचने लगे हैं। इसके साथ ही अब देश भर में किसानों ने महापंचायत शुरू कर दी है।

25 नवंबर को हैदाराबाद में महाधरना का आयोजन हुआ और 28 नवंबर यानी रविवार को मुंबई के आजाद मैदान में विशाल किसान-मजदूर महापंचायत होगी। इसका आयोजन संयुक्त शेतकारी कामगार मोर्चा के संयुक्त बैनर तले 100 से अधिक संगठनों ने किया है। संभावना है कि पूरे महाराष्ट्र और आसपास के राज्यों से हजारों किसान यहां इकट्ठा होंगे। एसकेएम की शनिवार को एक बैठक में आगे की रणनीति तय की जाएगी। 



अभी देश में 23 फसलों की एमएसपी घोषित होती है। इसमें मुख्य रूप से खाद्यान्न- गेहूं, धान, मोटे अनाज, दालें, तिलहन, गन्ना व कपास जैसी कुछ नकदी फसलें शामिल हैं। दूध, फल, सब्जियों, मांस, अंडे आदि की एमएसपी घोषित नहीं होती। एक अनुमान के अनुसार निजी व्यापारी एमएसपी से औसतन 20 प्रतिशत कम मूल्य पर फसलें खरीदते हैं।

एमएसपी - फोटो : pixabay
एमएसपी पर कानून की मांग आंदोलन का कोर एजेंडा था
जानकार बताते हैं कि किसानों के आक्रमक रवैए और तीनों कृषि कानून रद्द किए जाने के फैसले से उनके उत्साह को देखकर यह जाहिर है कि किसान अब एमएसपी पर कानून की गारंटी के बिना यह आंदोलन खत्म नहीं करेंगे।

कृषि मामलों के विशेषज्ञ और रूरल व्हाइस के प्रमुख संपादक हरवीर सिंह बताते हैं कि एमएसपी किसानों के कोर एजेंडे में शामिल था। उनकी जो मुख्य मांगें थी उसमें तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने और एमएसपी पर कानून बनाना सबसे प्रमुख था। किसान संगठन पहले दिन से ही एमएसपी पर गारंटी कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में जब तीनों कृषि कानून वापस ले लिए गए हैं तो किसानों को भरोसा है कि एमएसपी पर भी कानून बनाने की उनकी मांग मान ली जाएगी। उनके मुताबिक आंदोलन का नेतृत्व करने वाले किसान नेता नैतिक रूप से इस मुद्दे को नहीं छोड़ नहीं सकते क्योंकि उन्हें इसी उम्मीद में आंदोलन के लिए समर्थन मिला है कि सरकार एमएसपी पर भी कानून बनाने की उनकी बात मान लेगी। 

सरकार के आगे रास्ता क्या?   
माना जा रहा है कि किसान आंदोलन की वजह से भारतीय जनता पार्टी को अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर खास तौर पर तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में भारी सियासी नुकसान होने की आशंका थी। लिहाजा सरकार इस कानून को रद्द करने पर विवश हुई। पार्टी को डर है कि  यदि यह आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं होता है और किसान अपने घर नहीं लौटते हैं तो तीनों कृषि कानून वापस लिए जाने की बाद भी विधानसभा चुनावों पर इसका असर पड़ सकता है और इसका वह नतीजा नहीं मिलेगा जिसकी उम्मीद में तीनों कानून वापस लिए गए थे। माना जा रहा है कि सरकार अब एमएसपी पर भी कोई बड़ा फैसला कर सकती है। सूत्रों का कहना है कि फिलहाल सरकार इस पर विभिन्न पक्षों की राय जान रही है।

जानकार बताते हैं कि सरकार ने जिस उम्मीद में यह कानून वापस लिया था कि इससे माहौल सामान्य हो जाएगा, किसानों का गुस्सा ठंडा होगा और किसान अपने घरों को लौट जाएंगे, ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि इसके उलट माहौल यह बन रहा है कि जब सरकार ने तीनों कानून वापस लेने की मांग मान ली है तो एमएसपी पर कानून नहीं बनाने की जिद्द क्यों? 
 

किसान आंदोलन फाइल फोटो। - फोटो : amar ujala
एमएसपी पर कानून बनाने का ही विकल्प खुला
हरवीर सिंह मानते हैं सरकार के पास किसानों की मांग मानने के अलावा अब कोई रास्ता नहीं बचा है क्योंकि किसानों का  इतना बड़ा आंदोलन और उसका इतना असर पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए सरकार को एमएसपी पर भी कानून बना देना चाहिए, क्योंकि किसानों की रणनीति से यह साफ समझ में आ रहा है कि वे इसकी गारंटी लिए बिना घर नहीं लौटेंगे। वे बताते हैं सरकार ने दो साल पहले चीनी पर पर न्यूनतम बिक्री दर तय कर दी थी। इससे यह तय हो गया कि इससे नीचे कोई नहीं खरीदेगा। तो बाकी उत्पादों में भी ऐसा करने में क्या दिक्कत है?  

वे कहते हैं देश में जितना कृषि उत्पादन होता है उसकी पूरी खपत देश में हो जाती है, ऐसे में यदि एमएसपी पर गारंटी कानून बनने से किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य मिल पाएगा। यह व्यवस्था होनी ही चाहिए कि एमएसपी पर ही किसानों की उपज खरीदी जाए। यदि इस मांग को मान लिया जाता है तो सरकार के ऊपर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा, केवल निजी व्यापारी जो अब तक किसानों का आर्थिक शोषण करते रहे हैं उन पर अंकुश अवश्य लगेगा।


 
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