कृषि कानूनों की वापसी का फैसला मोदी सरकार कर चुकी हैं। इसके साथ ही किसानों के आंदोलन को एक साल भी पूरा हो रहा है। पिछले एक साल में किसान संगठनों ने काफी उतार चढ़ाव देखे। लेकिन एकता और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहना ही उनकी असली ताकत रही।
दरअसल, कृषि विधेयक लाने से पहले किसान संगठनों को भरोसे में न लेना सरकार को भारी पड़ गया। पंजाब-हरियाणा में शुरुआती असंतोष को दो राज्यों में सीमित मानकर नजरअंदाज कर दिया गया। केंद्र सरकार की यही रणनीतिक गलतियां अंततः कानून वापसी की वजह बनीं।
अचानक कृषि कानून बनते ही किसान समुदाय में विरोध का उबाल आ गया है। पंजाब में किसान संगठनों ने मोर्चा खोला और जगह-जगह रेलें रोकते हुए अंबानी-अडानी समूहों के प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जाने लगा। हरियाणा में भी किसान संगठनों ने भी कानूनों का उग्र विरोध शुरू किया हालांकि पंजाब-हरियाणा संगठनों के सामने देशभर के किसानों को जोड़ने और सरकार पर दबाव बनाने की चुनौती थी।
इसके लिए संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले देशभर के करीब 500 किसान संगठनों को जोड़ा गया। नतीजे में पंजाब-हरियाणा से निकलकर विरोध देशभर में फैलने लगा। किसान संगठनों को लगा कि वो राज्य में प्रदर्शन करते रहे तो केंद्र की सरकार पर दबाव बनाना मुश्किल होगा, इसी के साथ आंदोलन ने दिल्ली की ओर रुख कर लिया।
पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी यूपी से चले किसानों को रास्ते में रोकने के हर संभव प्रयास हुए। हाईवे पर उनके ट्रैक्टर न निकल पाएं, इसके लिए बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गए। आंसू गैस के गोले समेत बल प्रयोग किया गया। पर किसानों को रोकना आसान नहीं था।
आखिरकार 26 नवंबर, 2020 को पंजाब-हरियाणा के किसान दिल्ली के सिंघु बार्डर पर पहुंच गए। सुरक्षाबलों के साथ झड़पों के बाद किसानों ने यहीं पर डेरा डाल दिया। उधर, गाजीपुर बार्डर, टिकरी बार्डर और शाहजहांपुर बार्डर पर भी हिंसक झड़पों के साथ किसानों ने डेरा जमा लिया।
सरकार की पेशकश नहीं आई रास
किसानों के विशाल जमावड़े और साथ ही सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने सरकार को वार्ताओं का दौर शुरू करने पर मजबूर कर दिया। सरकार ने किसान नेताओं के दल को मिलने के लिए बुलाया और कानूनों की वापसी न करके संशोधनों पर बात करने की कोशिश की। सरकार के इस रवैये से भड़के किसानों ने तय कर लिया कि तीनों कानूनों की वापसी के बाद ही कोई बात होगी। 11 दौर की बातचीत के बाद भी कोई हल नहीं निकल सका।
चुनावी बिसात पर संघर्ष
वार्ताओं के लंबे दौर विफल होने पर भी किसानों ने हार नहीं मानी। मोदी सरकार पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए देश भर में महापंचायतें शुरू करने के साथ ही उन राज्यों में विरोध करना शुरू किया, जहां चुनाव होने थे। संयुक्त किसान मोर्चे की बैठकें पश्चिम बंगाल में भी हुईं। इसी के साथ मिशन यूपी, मिशन पंजाब और मिशन उत्तराखंड की भी बात उठने लगी। किसान संगठनों की कोशिश थी कि किसानों के बीच ये बात पहुंचाई जाए कि सरकार किसानों की सुन नहीं रही, और ये कानून किसान विरोधी हैं। इसमें उन्हें सफलता मिली।