साड़ी भारतीय संस्कृति की पहचान है। साड़ी एकमात्र ऐसा परिधान है जो पांरपरिक और आधुनिक फैशन में फिट बैठता है। आज हम एक ऐसे परिवार के बारे में बात करने जा रहे जो पटोला साड़ी को बुनने का काम करता है। पटोला साड़ी की खास बात यही है कि यह हाथ से बनाई जाती है। वहीं गुजरात में साल्वे परिवार पटोला साड़ियों की 900 साल पुरानी विरासत को जिंदा रखे हुए है।
ऐसा कहा जाता है कि पटोला साड़ियों को सबसे पहले 11वीं शताब्दी में बनाना शुरू किया गया था। सोलंकी वंश के राजा कुमारपाल ने महाराष्ट्र के जलना से पटोला बुनने वाले 700 परिवारों को पाटन में बसने के लिए बुलाया था और और साल्वे उनमें से एक हैं। इस तरह पाटन पटोला की परंपरा शुरू हुई थी। ऐसा माना जाता है कि पटोला साड़ियों को खास राजा और उनकी महारानियों के लिए बनाया जाता था।
प्राकृतिक रंगों का होता है इस्तेमाल
एएनआई से बात करते हुए, साल्वे परिवार के सबसे बड़े सदस्यों में से एक, 68 वर्षीय भरत साल्वे ने पटोला रेशम का इतिहास बताया। भरत साल्वे ने कहा कि यह पटोला करघा यहां 11वीं सदी में आया था, जब राजा हर दिन अपनी पूजा के लिए पटोला का इस्तेमाल करना चाहते थे। वह जैन थे। हम अब भी पारंपरिक प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं।
पटोला साड़ी की कीमत 1.5 लाख रुपये से 6 लाख रुपये तक
उन्होने बताया कि इसमें बहुत बारीकी से काम होता है। साड़ी पूरी तरह से प्रिंटेड होती है और धागे को इतनी बारीकी से बंधा और रंगा जाता है जिससे एक डिजाइन बन जाए। पटोला साड़ी की खासियत इस बात से मान सकते हैं कि एक असली पटोला साड़ी की कीमत 1.5 लाख रुपये से शुरू होती है और इसकी कीमत 6 लाख रुपये तक हो सकती है। भरत साल्वे भी इस बात की पुष्टि करते हैं।
एक साड़ी तैयार करने में लगते छह महीने
वहीं परिवार के अन्य सदस्य रोहित साल्वे ने कहा कि एक साड़ी तैयार करने में लगभग छह महीने और लगभग 18-19 प्रक्रियाएँ लगती हैं। हम बेंगलुरु से कच्चा रेशम खरीदते हैं और फिर रेशम के धागों को सेट किया जाता है फिर नरम करने जैसी कई प्रक्रियाएं की जाती हैं। आगे बताते हुए, उन्होंने कहा कि साड़ी पर औसतन 4-5 रंगों का उपयोग किया जाता है और साड़ी तैयार करने का समय रंगों की संख्या और डिजाइनों की गहनता पर निर्भर करता है। जितने ज्यादा रंग या डिजाइन उतना समय साड़ी बनाने में लगेगा।
आर्किटेक्ट में करियर छोड़ अपनाया फैमिली बिजनेस
रोहित साल्वे ने आगे जानकारी दी कि हमें एक साड़ी तैयार करने के लिए 4-5 श्रमिकों की आवश्यकता होती है। बुनकर सदियों पुराने हैं और ऐसी कोई मशीन नहीं है जो इस मानव निर्मित श्रम की जगह ले सके। वहीं राहुल ने कहा कि उन्होंने आर्किटेक्ट में ग्रेजुएशन किया है लेकिन अपना अच्छा खासा करियर छोड़कर परिवार की परंपरा को अपनाया है। उनके मुताबिक 28वीं पीढ़ी है जो पटोला साड़ी बुनाई में है।
राहुल ने एएनआई को बताया कि हम इस पेशे में पिछले 900 सालों से हैं और मैं 28वीं पीढ़ी का हूं। पेशे से आर्किटेक्ट होने के बावजूद मैंने पारिवारिक परंपरा को अपनाया और पिछले 22 सालों में इसमें महारत हासिल की है। उन्होंने कहा कि बाजार में नकली पटोला साड़ी भी हैं जो सस्ती दरों पर बेची जा रही हैं, लेकिन लोगों को समझाया जाना चाहिए कि असली पटोला साड़ियों को सस्ता नहीं बनाया जा सकता।