बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आयुर्वेद के प्रोफेसर डॉक्टर करतार सिंह धीमान ने अमर उजाला से कहा कि गौमूत्र में औषधीय गुण होने पर कोई संदेह नहीं है। यह शरीर के कफ दोष को कम करने में बेहद उपयोगी है। सौ से अधिक आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में एक घटक के रूप में गौमूत्र का उपयोग किया जाता है। पंचगव्य घृत के निर्माण में भी इसकी भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है। इससे रोगियों को स्पष्ट लाभ मिलने के वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं।
गौमूत्र की दवाओं का वैज्ञानिक अध्ययन मिर्गी के रोगियों पर किया गया था। मिर्गी (Epilepsy) के रोगियों की दवा बेहद कड़ी और अम्लीय असरकारक होती है। लंबे समय तक इसके सेवन से रोगी को नुकसान होने की आशंका होती है। लेकिन अगर इन्हीं रोगियों को जब गौमूत्र निर्मित दवाएं दी गईं, तो उन्हें इन दवाओं की कम मात्रा का सेवन करना पड़ा। इसके साथ ही उन्हें यह दवाएं ज्यादा लंबी अवधि तक भी नहीं लेनी पड़ीं। इस अध्ययन से प्राप्त परिणाम बताते हैं कि गौमूत्र के औषधीय गुणों से बिलकुल इनकार नहीं किया जा सकता।
‘शोध होना जरूरी’
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की वरिष्ठ पदाधिकारी डॉक्टर राधा जैन ने कहा कि बिना किसी रिसर्च और वैज्ञानिक अध्ययन के एलोपैथी कोई भी बात स्वीकार नहीं करता। इसलिए जब तक कोरोना रोगियों पर गौमूत्र के असर का कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं होता, इस पर कोई भी टिप्पणी करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि हल्दी, नीम या एलोवेरा के अंदर पाए जाने वाले तत्त्वों के कारण उनकी औषधीय उपयोगिता सिद्ध हुई है। इसी प्रकार अगर वैज्ञानिक प्रयोगों में गौमूत्र के असर का प्रमाण मिल जाएगा तभी उसे सही कहना उचित होगा। फिलहाल अभी तक इस विषय पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं है।
होमियोपैथी विशेषज्ञ डॉक्टर संजय गुप्ता ने कहा कि वातावरण को शुद्ध करने के लिए हमारे पास कई प्राकृतिक तरीके उपलब्ध रहे हैं। परंपरागत तौर पर हमारे बुजुर्ग लोबान या गूगल का धुंआ करके वातावरण से वायरस या बैक्टीरिया को दूर करने का सफल प्रयास करते आये हैं।
इसलिए इन वस्तुओं के औषधीय गुणों को इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन गौमूत्र का कोरोना वायरस पर पड़ने वाले असर का अभी तक कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ है, इसलिए अभी इस तरह का कोई दावा नहीं किया जा सकता।