जल्द विधानसभा चुनाव का सामना करने वाले गुजरात का सियासी समीकरण कई नए चेहरों के सियासी दांव ने पूरी तरह उलझा कर रख दिया है।
ओबीसी, एससी, एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश ठाकोर, राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के जिग्णेश मेवाणी, पाटीदार अमानत आंदोलन समिति के हार्दिक पटेल जहां एक मंच पर आने की कोशिश में हैं, वहीं कांग्रेस छोड़ कर जन विकल्प पार्टी बना कर मैदान में उतरने में जुटे शंकर सिंह वाघेला छोटे-छोटे दलों को साधने की कोशिशों में जुटे हैं।
इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने 150 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने की घोषणा कर सियासी गुत्थी उलझा कर रख दी है।
दरअसल नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कारण गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद दलित, पाटीदार समुदाय भाजपा से नाराज हैं। जबकि ओबीसी की कुछ अन्य जातियां भी आंदोलनरत हैं।
मेवाणी, हार्दिक, अल्पेश के बीच संयुक्त मोर्चा बनाने की कवायद जारी है। जबकि कांग्रेस किसी भी तरह नाराज पाटीदार समुदाय को अपनी ओर खींचने के लिए हार्दिक को साधने में जुटी है।
जबकि अल्पेश से भी अंदरखाने बात कर रही है। निश्चित रूप में जब तक मेवाणी, हार्दिक, अल्पेश साथ आते हैं या कांग्रेस हार्दिक को साधने में सफल रहती है तो भाजपा की चुनौती बढ़ जाएगी।
इसके उलट अगर सबने एकला चलो राग अलापा तो सत्ता विरोधी वोटों में बुरी तरह बिखराव हो सकता है। खासतौर से वाघेला खुद भी पाटीदार वर्ग को साधने की कोशिश में हैं।
भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि बीते विधानसभा चुनाव में खुद मोदी के चेहरा होने के बावजूद उसके और कांग्रेस के बीच 9 फीसदी मतों का ही अंतर था। तब पाटीदार और ओबीसी का बड़ा तबका भाजपा के साथ था, जबकि अब पाटीदार और दलित तबका जो कि कुल मतदाताओं का 25 फीसदी है पार्टी से नाराज चल रहा है।
इसके अलावा जीएसटी के कारण व्यापारी वर्ग की भी नाराजगी बढ़ी है। ऐसे में अगर गुजरात के तीन नए चेहरे अलग-अलग लड़े और वाघेला-आप ने अलग-अलग दस्तक दी तो यह स्थिति भाजपा के अनुकूल होगी।