प्रतिबंधित संगठन उल्फा के पूर्व लेफ्टिनेंट बिपुल कलिता से जुड़ी एक रोचक बात सामने आई है। बताया जा रहा है कि कलिता को साफ-सफाई बेहद ही पसंद थी। जब वह किशोर था, तो उसने बंदूक की नोक पर शहर में सफाई करने की कोशिश की थी। हालांकि, बड़े होने पर वह वास्तविकता से रू-ब-रू हुए। आज का समय यह है कि वह असम में कचरा-संग्रह उद्यम चलाते हैं।
कलिता ने करीब 12 साल तक प्रतिबंधित यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के साथ काम किया। बाद में हथियार त्यागने का मन बनाया। साल 2000 में उन्होंने संगठन का साथ छोड़ दिया और तब से वह अपने पैतृक स्थान पर अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ बस गए। पहले कुछ वर्षों तक काम करने के बाद उन्होंने फैसला किया कि वह शहर में सफाई के लिए कुछ करेंगे।
महिलाएं भी समूह का हिस्सा
असम में, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) शहरी क्षेत्रों में डोर-टू-डोर कचरा संग्रह में लगे हुए हैं। अब उनके पास सात वाहन और कर्मचारी हैं। इन लोगों में ड्राइवर और अन्य सहयोगी शामिल हैं, जिनके पास कचरा संग्रह और निपटान का काम है। उन्होंने कहा कि हमारे साथ 20-25 महिलाएं भी काम कर रही हैं। कचरा संग्रहण के अलावा, हमारे पास कचरे को खाद में बदलने के लिए दो मशीनें हैं। ये मशीनें शिवसागर नगरपालिका बोर्ड द्वारा दी गई थीं।
पैसों की कमी बनी चुनौती
उन्होंने कहा कि हमें प्रति परिवार प्रति माह 60 रुपये मिलते हैं, जिसमें से हम नगरपालिका बोर्ड को 10 रुपये का भुगतान करते हैं। वाणिज्यिक भवन मासिक शुल्क के मामले में थोड़ा अधिक भुगतान करते हैं, लेकिन हमें इसका 50 प्रतिशत बोर्ड को देना होता है। उन्होंने नगर निगम बोर्ड से अपील की है कि टैक्स माफ कर दिया जाए, जिससे कुछ मार्जिन मिल सके।
1986 में शामिल हुआ था उल्फा में
प्रतिबंधित उल्फा के सदस्य के रूप में काम करने पर कलिता ने कहा कि सन् 1986 में एक पड़ोसी से प्रभावित होकर उल्फा में शामिल हो गया था। मैं उस समय लगभग 17-18 साल का था। उस समय संगठन द्वारा प्रचारित विचारधारा सही लगती थी। इस दौरान म्यांमार के काचिन प्रांत में रहे, यहां प्रशिक्षण शिविरों तक पहुंचने से पहले ही कई लड़कों की मृत्यु हो गई थी। अज्ञात बीमारियों ने हम लोगों को जकड़ लिया और कोई दवा नहीं थी। फिर भी हम जीवित रहे और तीन-चार साल बाद असम लौट आए।
अब समय बदल गया- कलिता
कलिता ने कहा कि अब समय बदल गया है। जब हमने हथियार उठाए थे, वह एक अलग उम्र थी। हम अब संगठन और सरकार के बीच शांति वार्ता का अनुसरण कर रहे हैं, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि मेरे जैसे कई लोगों को हमारे आत्मसमर्पण के बाद सरकार से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली। हमें उम्मीद है कि प्रशासन सहानुभूति रखेगा और हमारी मदद करेगा।