ONOE: पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ और जे. एस. खेहर ने ‘एक देश, एक चुनाव’ विधेयक में चुनाव आयोग को दिए गए विशेष अधिकारों पर चिंता जताई, लेकिन कहा कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। खेहर ने सुझाव दिया कि चुनाव की तारीख तय करने में संसद या केंद्र की भूमिका होनी चाहिए, न कि सिर्फ चुनाव आयोग की। साथ ही, उन्होंने आपातकाल और विधानसभा का अल्प कार्यकाल जैसे मुद्दों पर विधेयक में स्पष्टता की जरूरत जोर दिया।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों (सीजेआई) डी. वाई. चंद्रचूड़ और जे. एस. खेहर ने ‘एक देश, एक चुनाव’ विधेयक की कुछ प्रावधानों पर चिंता जताई है, खासकर उन प्रावधानों पर जो चुनाव आयोग को अतिरिक्त अधिकार देते हैं। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यह विधेयक संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी।
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सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस की प्रियंका गांधी सहित विपक्षी नेताओं ने इस बात पर सवाल उठाया कि अगर विधानसभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग कर दिया गया तो क्या यह संविधान सम्मत है। इस पर खेहर का सुझाव था कि इस फैसले में संसद या केंद्र सरकार की भूमिका होनी चाहिए, न कि केवल चुनाव आयोग की।
धारा 82ए (5) के अनुसार, यदि किसी विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराना संभव नहीं है, तो चुनाव आयोग राष्ट्रपति को सिफारिश कर सकता है कि उस विधानसभा का चुनाव बाद में कराया जाए। इस पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. एस. खेहर ने सुझाव दिया कि विधेयक में यह भी साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि यदि देश में आपातकाल की स्थिति आ जाए, तो उस दौरान चुनावों की प्रक्रिया कैसे चलेगी।
एक अन्य चिंता यह भी जताई गई कि यदि किसी विधानसभा का शेष कार्यकाल केवल कुछ महीने ही बचा हो, तो क्या उस स्थिति में चुनाव कराना उचित होगा या नहीं, इस पर भी विधेयक में स्पष्टता होनी चाहिए।
संसदीय समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद पी. पी. चौधरी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि समिति विभिन्न विशेषज्ञों के विचारों का स्वागत करती है और सभी मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा करेगी। उन्होंने कहा, यह देश निर्माण का एक दुर्लभ अवसर है और समिति का उद्देश्य इस विधेयक को बेहतर बनाना है, न कि इसे जस का तस वापस करना।
अब तक चार पूर्व मुख्य न्यायाधीश और कई कानूनी विशेषज्ञ समिति के सामने पेश हो चुके हैं। समिति की शुक्रवार को आठवीं बैठक हुई, जिसमें पूर्व राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील ई. एम. सुदर्शन नचियप्पन ने भी अपने सुझाव साझा किए।