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EWS Row: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आरक्षण उत्पीड़ित वर्ग के लिए, गरीब सवर्णों को दी जा सकती हैं दूसरी सुविधाएं

Thu, 22 Sep 2022 10:26 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि सदियों से जाति और व्यवसाय के कारण कलंकित लोगों को आरक्षण दिया गया है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media
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विस्तार
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यह देखते हुए कि गरीबी एक स्थायी चीज नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि उच्च जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) को विभिन्न सकारात्मक कार्यों के माध्यम से बढ़ावा दिया जा सकता है। जैसे कि उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10 प्रतिशत कोटा के बजाय छात्रवृत्ति देना। अदालत ने कहा कि आरक्षण शब्द के सामाजिक और वित्तीय सशक्तिकरण जैसे अलग-अलग अर्थ हैं और यह उन वर्गों के लिए है जो सदियों से उत्पीड़ित हैं।

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अगड़ी जातियों के छात्रों को छात्रवृत्ति और मुफ्त शिक्षा दें 
चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि सदियों से जाति और व्यवसाय के कारण कलंकित लोगों को आरक्षण दिया गया है और अगड़ी जातियों के छात्रों को छात्रवृत्ति और मुफ्त शिक्षा जैसी सुविधाएं दी जा सकती हैं। जब अन्य आरक्षणों के बारे में बात करें तो यह वंश से जुड़ा हुआ है। वहीं पिछड़ापन कोई अस्थायी चीज नहीं है, बल्कि यह सदियों और पीढ़ियों तक चला जाता है। लेकिन आर्थिक पिछड़ापन अस्थायी हो सकता है।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 103 वें संविधान संशोधन का बचाव करते हुए कहा कि सामान्य वर्ग के ईडब्ल्यूएस के लिए 10 प्रतिशत कोटा एससी, एसटी और ओबीसी के लिए उपलब्ध 50 प्रतिशत आरक्षण को छेड़े बिना प्रदान किया गया है। किसी संवैधानिक संशोधन को यह स्थापित किए बिना रद्द नहीं किया जा सकता है कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है। दूसरा पक्ष इस बात से इंकार नहीं कर रहा है कि उस अनारक्षित वर्ग में संघर्ष कर रहे या गरीबी से जूझ रहे लोगों को किसी सहारे की जरूरत है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है।
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पीठ ने कहा, जो पेश किया जा रहा है वह यह है कि आप थ्रेशोल्ड स्तर पर पर्याप्त अवसर देकर उस वर्ग को ऊपर उठाने का प्रयास कर सकते हैं, जैसे कि 10 + 2 स्तर पर उन्हें छात्रवृत्ति दें। उन्हें फ्रीशिप दें ताकि उन्हें सीखने का अवसर मिले, वे खुद को शिक्षित करें या खुद को ऊपर उठाएं। अदालत ने कहा कि एक पारंपरिक अवधारणा के रूप में आरक्षण के अलग-अलग अर्थ हैं और यह केवल वित्तीय सशक्तिकरण नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक सशक्तिकरण के बारे में भी है।
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