देश में हर चौथा वयस्क उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) से पीड़ित है लेकिन इनमें से सिर्फ 10 फीसदी रोगियों का रक्तचाप (बीपी) नियंत्रण में रहता है। यह स्थिति तब है जब अनियंत्रित बीपी को साइलेंट किलर कहा जाता है। लोगों को इससे बचाने के लिए केंद्र सरकार ने हाइपरटेंशन से लड़ाई में बड़ा कदम उठाया है।
सरकार ने 21 राज्यों के 100 जिलों में हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव कार्यक्रम का दूसरा चरण भी शुरू कर दिया है, जिसके तहत पांच साल में 20 लाख से भी ज्यादा मरीजों का पंजीकरण हुआ है। इनमें 47 फीसदी रोगियों का बीपी अब नियंत्रण की स्थिति में है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबक, यह बदलाव नियमित जांच और स्वास्थ्य निगरानी की वजह से सामने आया है।
साल 2017 में रक्तचाप को लेकर भारत सरकार ने यह कार्यक्रम शुरू किया, जिसका पहला चरण 26 जिलों में चला था। इसे अब 104 जिलों तक पहुंचाया है, जहां करीब 13,821 अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में रक्तचाप की जांच, निगरानी और इलाज की सुविधा का विस्तार हुआ है।
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तीन स्तर पर हो रहा काम
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्यसलिला श्रीवास्तव ने बताया कि हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव कार्यक्रम (आईएचसीआई) आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से चलाया जा रहा है। इसके तहत तीन स्तर पर काम किया जा रहा है, जिसमें पहला मानकीकृत इलाज प्रोटोकॉल है, जिसमें देश भर में इलाज की प्रक्रिया और दवाओं को एक समान बनाना है। दूसरा स्तर, डिजिटल टूल्स और डाटा ट्रैकिंग है, जिसमें बीपी पासबुक, मोबाइल ऐप और डिजिटल रजिस्ट्रेशन की सुविधा है। तीसरा, गांव से शहर तक इलाज की उपलब्धता यानी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाएं और नियमित फॉलोअप की सुविधा का विस्तार करना है।
रक्तचाप नियंत्रण में तमिलनाडु सबसे आगे
तमिलनाडु में उच्च रक्तचाप से जूझ रहे लोगों के इलाज में बड़ा सुधार आया। 2019-20 में जहां केवल 7.3% मरीजों का बीपी नियंत्रण में था, वहीं 2023-24 तक यह 17% तक पहुंच गया है। यह निष्कर्ष एक सर्वे में सामने आया जिसके लिए शोधकर्ताओं ने 18 से 69 वर्ष के कुल 8,880 वयस्कों की जांच की और इनमें 29.6% उच्च रक्तचाप रोगियों की पहचान की।
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पहले चरण में दिखे यह बदलाव...
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव कार्यक्रम (आईएचसीआई) के पहले चरण की सफलता रिपोर्ट भी जारी की है। इसमें बताया कि जब पंजाब, केरल, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र सहित पांच राज्यों के 26 जिलों में इस मॉडल को लागू किया तो कुछ समय बाद पाया कि स्थानीय आबादी में गैर संचारी रोगों के प्रति जागरूकता में 6.1%, उपचार में 3.9% और बीपी नियंत्रण में 6.7% से भी अधिक बदलाव आया है।