प्रख्यात वैष्णव विद्वान और बारपेटा सत्र के सत्राधिकारी वशिष्ठ देव सरमा का शनिवार को निधन हो गया। 84 वर्ष की उम्र में उन्होंने गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल (जीएमसीएच) में अंतिम सांस ली। पारिवारिक सूत्रों ने जानकारी दी।
सरमा के परिवार में एक बेटा और दो बेटियां हैं। वह वृद्धावस्था की कई बीमारियों से जूझ रहे थे। 15 अक्तूबर को उन्हें जीएमसीएच में भर्ती कराया गया था।
सरमा को प्रतिष्ठित 'श्रीमंत शंकरदेव पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें कई अन्य सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चुका था। वह रत्त्निया संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के विशेषज्ञ माने जाते थे।
उन्होंने कई देशों का भी दौरा कर वहां प्रदर्शन किया था। सरमा ने एक स्कूल के शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। साल 1993 में वह डेका (जूनियर) सत्राधिकारी चुने गए। इसके बाद साल 2007 में उन्हें बारपेटा सत्र (वैष्णव मठ) का ब्यूरो सत्राधिकारी चुना गया था।
उनके निधन पर असम के राज्यपाल जगदीश मुखी ने भी दुख जताया है। राज्यपाल ने अपने संदेश में कहा, सरमा एक आध्यात्मिक नेता और एक विद्वान वैष्णव थे, जिन्होंने सत्त्रिया संस्कृति को बढ़ावा देने का काम किया। उन्होंने आगे कहा, उनका निधन राज्य के सामाजिक-सांस्कृति और आध्यात्मिक क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है, लेकिन उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियो के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी रहेगी।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने भी अपना शोक संदेश जारी किया और कहा कि बुरहा सत्राधिकारी ने असम के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन में अमूल्य योगदान दिया है। उनका निधन समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। मैं दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं।