2030 तक फाइलेरिया को खत्म करने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) को बड़ी कामयाबी मिली है। भारतीय वैज्ञानिकों ने फाइलेरिया के कारक एजेंट डब्ल्यू.बैनक्रॉफ्टी के 12 एंटीजन क्लोन बनाए हैं, जिनकी मदद से वे एलाइजा जांच किट तैयार कर सकेंगे।
आईसीएमआर के अधीन पुडुचेरी स्थित वेक्टर कंट्रोल रिसर्च सेंटर (वीसीआरसी) बीते लंबे समय से फाइलेरिया को लेकर यह खोज कर रहा था। अब निजी कंपनियों के साथ मिलकर जांच किट बनाने के लिए एंटीजन क्लोन का उत्पादन किया जाएगा। 12 एंटीजन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का इस्तेमाल लसीका फाइलेरिया के निदान में किया जाएगा। इसमें करीब दो से तीन माह का वक्त लग सकता है। इस साल के अंत तक जांच किट तैयार होना शुरू होगीं। वीसीआरसी के निदेशक डॉ. अश्विनी कुमार ने बताया कि अभी तक फाइलेरिया की निगरानी काफी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इंसानों के शरीर में इसका पैथोजन रात नौ बजे के बाद रक्त में फैलना शुरू होता है।
दुनिया के 40 फीसदी मामले भारत में
जब रात में मच्छर काटता है तो पैथोजन रक्त में बढ़ने लगते हैं लेकिन दिन में यह फेफड़ों में छिपा रहता है। इसकी वजह से कई बार संक्रमण का पता भी नहीं चल पाता है। फाइलेरिया एक मच्छर जनित रोग है, इस बीमारी में व्यक्ति के पैरों में इतनी सूजन आती है कि उसका पैर हाथी के समान मोटा हो जाता है इसलिए इसे अक्सर हाथी पांव या एलिफेंटिएसिस के तौर पर भी जाना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में फाइलेरिया के 40 फीसदी मामले अकेले भारत में हैं।
जेनो मोनिटोरिंग में भी मिली सफलता
आईसीएमआर ने बताया कि कुछ समय पहले झारखंड और कर्नाटक में फाइलेरिया के जेनो मोनिटोरिंग के लिए दो प्रोजेक्ट शुरू किए थे, जिसमें सफलता मिली है। डॉ. अश्विनी कुमार ने बताया कि कुछ समय पहले आरटी पीसीआर क्षमता वाली तीन हजार से ज्यादा लैब का इस्तेमाल जेनो मोनिटोरिंग नेटवर्क स्थापित करने के लिए सरकार से अनुमति मांगी है। जेनोमोनिटोरिंग यानी मानव रोगजनकों का पता लगाने के लिए जिन लैब में अभी कोरोना वायरस की आरटी पीसीआर जांच हो रही है, वहां इसकी जांच की जा सकती है।