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Amar Ujala: 1948 में पाठकों तक पहुंचा पहला अंक; एक छोटे से भवन में था ऑफिस, यूं बना स्थानीय से राष्ट्रीय अखबार

Tue, 18 Apr 2023 06:21 AM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

#Amarujala75: अमर उजाला का प्रकाशन इस सोच के साथ शुरू हुआ कि आजादी के बाद नागरिकों में सामाजिक जागरूकता लाने के साथ जिम्मेदारी की भावना भी भरी जाए, ताकि एक नए भारत का निर्माण संभव हो सके।
 
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अमर उजाला के 75 साल। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश के 179 जिलों, छह राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों से प्रकाशित होने वाला ‘अमर उजाला’ अपने 22 संस्करणों के जरिये करोड़ों पाठकों का चहेता बना हुआ है, लेकिन यहां तक की यात्रा सुगम नहीं रही। 18 अप्रैल, 1948 को जब अखबार को पहला अंक प्रकाशित हुआ तो ये वो दौर था जब देश में ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित अंग्रेजी दैनिक अखबारों का वर्चस्व था। ऐसे में अमर उजाला का प्रकाशन इस सोच के साथ शुरू हुआ कि आजादी के बाद नागरिकों में सामाजिक जागरूकता लाने के साथ-साथ जिम्मेदारी की भावना भी भरी जाए ताकि एक नए भारत का निर्माण संभव हो सके। प्रकाशन के 75 वर्ष पूर्ण होने पर भी अमर उजाला अपने इस ध्येय में पक्षपातरहित, निडर और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के जरिये जुटा हुआ है। हमारे उच्च मानक वाली संपादकीय सामग्री पर पाठकों का भरोसा अटूट है। एक छोटे से भवन से शुरू हुआ सफर इस भरोसे के दम पर अखबार के 6 करोड़ पाठकों के अतिरिक्त amarujala.com और अमर उजाला एप पर 5 करोड़ से अधिक वैश्विक पाठकों, 45 लाख यूट्यूब सब्सक्राइबर्स, 10 लाख इंस्टाग्राम और 21 लाख ट्विटर फॉलोवर्स तक भी पहुंच चुका है। 

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एक छोटे से भवन में था ऑफिस
आगरा के कलाकुंज स्पीड कलर लैब के विजय गोयल के मुताबिक, उनके पिता सत्यनारायण गोयल ने अपनी डायरी में लिखा- अमर उजाला का ऑफिस तब पथवारी-बेलनगंज स्थित एक छोटे से भवन में था। तब न ऑफसेट मशीन थी, न टेलीप्रिंटर, न कंप्यूटर। अमर उजाला टाइप से कंपोज होकर छोटी-सी मशीन पर छपता था, जिसमें मशीनमैन कागज निकालता था और पेपरमैन कागज लगाता था। आज अमर उजाला हर क्षेत्र की समृद्धतम स्थिति में है, लेकिन तब पेपरमैन के न होने की स्थिति में डोरीलाल जी स्वयं पेपर निकालते थे। वह तथा मुरारीलाल जी देर रात प्रेस में अखबार छपने के बाद घर जाते थे और अगले दिन 12-1 बजे तक कार्यालय आ जाते थे। अमर उजाला की नींव के इस परिश्रम ने ही उसे सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया है। 

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यूं बना स्थानीय से राष्ट्रीय अखबार
विज्ञापनों की कहानी...अमर उजाला के स्थानीय से राष्ट्रीय होने की कहानी अखबार में छपे विज्ञापनों से समझी जा सकती है। अमर उजाला के शुरूआती संस्करणों में स्थानीय स्तर के विज्ञापन छपते थे लेकिन कुछ साल के भीतर ही हिंदुस्तान लीवर, टी बोर्ड, हरक्यूलिस मोटर जैसी कंपनियों के विज्ञापन छपने लगे। 

लक्स एक वैश्विक ब्रांड था जिसे 1925 में लॉन्च किया गया था। जिसके उत्पादों की श्रेणी में सबसे चर्चित ब्यूटी सोप था। उच्च और मध्यवर्गीय आबादी को लक्षित करते हुए, लक्स ने खुद को 'खूबसूरत चेहरों के पीछे के रहस्य' के रूप में ब्रांडेड किया।   


हरक्युलिस साइकिल एंड मोटर कंपनी लि. एक ब्रिटिश साइकिल निर्माता कंपनी थी जिसका भारत में बड़ा बाजार था। 50 के दशक में इसके विज्ञापन अमर उजाला में छपने लगे। हरक्युलिस अपने विज्ञापनों में संदेश देती कि "दस में से आठ साइकिल विक्रेताओं का कहना है कि हरक्युलिस आपके पैसे का सर्वाधिक मूल्य अदा करती है।"

इसी तरह लाइफबॉय ब्रिटिश यूनिलीवर कंपनी के साबुन का एक मशहूर ब्रांड था। भारत में यह "हिंदुस्तान युनिलिवर लिमिटेड" नाम से व्यापार करती थी। अमर उजाला की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए यह कंपनी विज्ञापनदाता बन गई। कंपनी लाइफबॉय, डालडा, विम, रेक्सोना और सनलाइट साबुन जैसे कई घरेलू उत्पाद बनाती थी। गोल्डन टोबैको यानी जीटीसी भी अमर उजाला को विज्ञापन देने लगी। फेवरे लेउबा स्विस घड़ी बनाने वाली 18वीं सदी की सबसे पुरानी कंपनी और भारत का टी बोर्ड भी विज्ञापन देने में पीछे नहीं रहा। एनासिन और एस्प्रो जैसी दवा कंपनियां भी अपने विज्ञापन भेजती थीं। 



अमर उजाला ने दो साल पूरे होने पर इनहाउस विज्ञापन छापा-"अनेक प्रहारों, कठिनाइयों, संघर्षों का मुकाबला करते हुए आपका अमर उजाला तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। आशीर्वाद दीजिए।" होली के विशेष अंक में हास्य कविता "एडवर्टिजमेंट" छपी। जिसकी कुछ पंक्तियां हैं-

एडिटर साहब 'उजालाए अमर'/ आपकी खिदमत में वह हर साल दे/ एडवर्टिजमेंट मेरा छाप दें/ आप अपने नामवर अखबार में।

जनसरोकारों में भी आगे...
अमर उजाला जन सरोकार की प्रखर मशाल है और अमर उजाला फाउंडेशन के तहत कई तरह के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं-

  • शब्द सम्मान अलंकरण

भारतीय भाषाओं के सामूहिक स्वप्न के सम्मान में अमर उजाला फाउंडेशन ने शब्द सम्मानों की स्थापना की है। सर्वोच्च ‘आकाशदीप’ अलंकरण हिंदी और अन्य भारतीय भाषा के एक-एक साहित्य मनीषी को पांच-पांच लाख रुपये की राशि, प्रशस्ति पत्र और गंगा प्रतिमा के साथ अर्पित किया जाता है। इस क्रम में अब तक हिंदी के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी, ज्ञानरंजन, नामवर सिंह तथा शेखर जोशी के साथ ही, गिरीश कारनाड (कन्नड़), भालचंद्र नेमाड़े (मराठी), शंख घोष (बांग्ला) तथा प्रतिभा राय (उड़िया) को सम्मान दिया जा चुका है।  

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श्रेष्ठ कृतियों के लिए एक-एक लाख रुपये की राशि के साथ पांच अन्य सम्मान... थाप हिंदी में पहली कृति के लिए, तीन अलंकरण (छाप) कथा, कविता व गैर-कथा श्रेणियों में और भाषा बंधु भारतीय भाषा में अनुवाद के लिए है। 

  • अतुल माहेश्वरी छात्रवृत्ति

अमर उजाला  के नवोन्मेषक श्री अतुल माहेश्वरी की स्मृति में दी जा रही छात्रवृत्ति से अब तक हजारों बच्चों ने अपने सपने पूरे किए हैं। इसके तहत प्रति वर्ष देशभर के 43 बच्चों को 16.90 लाख रुपये की छात्रवृत्ति दी जाती है।
श्री डोरीलाल अग्रवाल राष्ट्रीय मेधावी दिव्यांग छात्रवृत्ति : इस छात्रवृत्ति से देश के हजारों दिव्यांगों के जीवन की दिशा बदली।

  • अपराजिता 

महिलाओं की प्रतिभा को मंच देने और उन्हें आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने के लिए अमर उजाला के सभी संस्करणों में सालभर ढेरों गतिविधियां आयोजित की जाती हैं।
पुलिस की पाठशाला : स्कूली छात्राओं को सुरक्षा व आत्मविश्वास के गुर बताने के लिए एसएसपी रैंक के अफसर करते हैं कार्यशाला।

  • बांदल घाटी परियोजना

अमर उजाला फाउंडेशन ने हेस्को के साथ मिलकर बांदल घाटी (उत्तराखंड) के 8 गांवों के विकास का जिम्मा लिया। महिला कल्याण, सशक्तीकरण व शिक्षा, कौशल विकास और आजीविका के अवसर पैदा कर क्षेत्र के लोगों के समग्र विकास पर फोकस किया गया है।

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