कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा है कि चुनाव याचिकाओं को आदर्श रूप से छह महीने के भीतर निपटाया जाना चाहिए। उसने ऐसी याचिकाओं को अगले चुनाव तक घसीटने की आदत पर तंज कसा। न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित ने 2018 में मुनिराजू गौड़ा द्वारा दायर एक चुनावी याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जो भाजपा उम्मीदवार के रूप में राजराजेश्वरी नगर विधानसभा सीट तत्कालीन कांग्रेस उम्मीदवार मुनिरथना नायडू से हार गए थे और वह अब भाजपा सरकार में मंत्री हैं।
अदालत ने दलीलों के दौरान यह टिप्पणी की, जब याचिकाकर्ता और प्रतिवादी दोनों के वकील जमा किए गए कुछ दस्तावेजों को सत्यापित करने को लेकर उलझ रहे थे। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का समय बर्बाद करना समझदारी नहीं है। मुनीराजू गौड़ा ने जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत नायडू को अयोग्य ठहराने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। नायडू बाद में भाजपा में शामिल हो गए और उपचुनाव में पार्टी से उसी विधानसभा सीट पर जीत हासिल की। जबकि गौड़ा अब सत्तारूढ़ दल से एमएलसी हैं।
गौड़ा ने गुरुवार को अदालत में गवाही दी। उन्होंने अपने आरोप को दोहराया कि चुनाव की घोषणा से पहले नायडू ने विभिन्न विभागों के अधिकारियों को उनकी पसंद के स्थानों पर स्थानांतरित कर दिया था। उन्होंने नायडू द्वारा कथित भ्रष्टाचार के बारे में अपनी शिकायत के संबंध में निचली अदालतों में लंबित अन्य मामलों के संबंध में अदालत को दस्तावेज भी जमा किए। गौड़ा ने यह भी दावा किया कि उन्होंने नायडू के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए शिकायतें दर्ज की हैं, जो एक शक्तिशाली व्यक्ति थे और राजनेताओं के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत के समक्ष एक आपराधिक मामला भी लंबित था।
जब मुनिराजू गवाह बॉक्स से अपना बयान दे रहे थे, तब न्यायमूर्ति दीक्षित ने अदालत के अधिकारी को गवाह बॉक्स में ही एक कुर्सी प्रदान करने का निर्देश दिया और कहा कि उन्हें खड़े होने की कोई आवश्यकता नहीं है। कुर्सी मिलने के बाद न्यायमूर्ति ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि लोग कुर्सियों से जुड़े हुए हैं और गौड़ा को सुनवाई के बाद अदालत में इस कुर्सी को छोड़ देना चाहिए।