आईसीपीए के पदाधिकारियों का कहना था कि जिस कंपनी को पिछले साल सात हजार करोड़ रुपये का लाभ हुआ हो और जिस पर पहले से ही 50 हजार करोड़ रुपये का कर्ज हो, ऐसे में सत्तर हजार करोड़ रुपए का सौदा कंपनी को बर्बाद कर देगा। बाद में सीएजी ने भी सरकार के इस फैसले पर यह कहते हुए सवाल उठाया था कि 111 विमानों की जरुरत नहीं थी तो फिर इनकी खरीद प्रक्रिया क्यों शुरू की गई।
आरोप था कि तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने विमानों की संख्या को अनावश्यक तौर पर बढ़वा दिया था। उस वक्त एयर इंडिया के सीएमडी वी तुलसीदास और मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी केके पदमनाभन की बैठक में भी ये फैसला लिया गया कि विमान खरीद प्रपोजल पर दोबारा से विचार किया जाए। बाकायदा कहा गया कि इसके लिए नए सिरे से रिपोर्ट तैयार हो।
तुलसीदास तो इसके लिए तैयार हो गए, मगर उस वक्त मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव वी सुब्रमण्यम, जिनके पास फाइनेंस एडवायजर का चार्ज भी था, वे अड़ गए। उन्होंने सौदे के प्रपोजल में बदलाव का विरोध किया। हालांकि बाद में प्रफुल्ल पटेल ने कहा, इस बाबत दोनों एयरलाइंस कंपनियों को कहा गया था कि वे अपने-अपने ट्रैफिक के हिसाब से विमानों की संख्या तय कर लें।
एयर इंडिया ने कहा था कि वे इस प्रपोपल में बदलाव चाहते हैं तो दूसरी ओर इंडियन एयरलाइंस ने इसमें किसी भी तरह के संशोधन से मना कर दिया था। इसके बाद यह मामला एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर ई-जीओएम के पास गया। बैठक के कई माह बाद सुनने को मिला कि मंत्रालय ने कई बातों में ई-जीओएम को अंधेरे में रखा था। उसके समक्ष सभी तत्थ पेश नहीं किए गए थे।
एयर इंडिया के सीएमडी रहे अश्विनी लोहानी भी तत्कालीन सरकार की विमान खरीद प्रक्रिया एवं दोनों कम्पनियों के विलय पर सवाल उठा चुके हैं। ईडी के एक अधिकारी का कहना है कि इस मामले में समन भेजने की सभी औपचारिकता पूरी कर ली गई हैं। तत्कालीन अफसरों को ईडी मुख्यालय में पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा। इस मामले में तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री से भी पूछताछ होगी। फिलहाल इस केस में पूछताछ के लिए डेढ़ दर्जन लोगों को समन भेजा जाएगा।