केंद्रीय जांच एजेंसियों की अति सक्रियता से राजनीतिक सिस्टम में बेचैनी है। ये बेचैनी एकतरफा नहीं, दोतरफा है। जो दल सत्ता में हैं, वे भी परेशान हैं तो दूसरी ओर विपक्ष, जिसके नेताओं के यहां आए दिन केंद्रीय जांच एजेंसियां दस्तक दे रही हैं, उनकी सांस फूले जा रही है। राजनीतिक जानकार कहते हैं, देखिये अभी '75' जैसे हालात तो नहीं हैं। सियासत के मौजूदा दौर में '2024' भाजपा की पहुंच में है, मगर फिर भी शीर्ष नेतृत्व कुछ उतावलेपन में नजर आ रहा है। एक तरफ 'ईडी' का वार है तो दूसरी ओर 'हर घर तिरंगा' की तैयारी जोरों पर है। यही वे दो बातें हैं जो सत्ताधारी नेताओं के उतावलेपन को जाहिर करती हैं।
ईडी के छापों से देश में राजनीतिक माहौल गर्माया हुआ है। प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष समेत कई नेता 'जांच एजेंसी' की पूछताछ का सामना कर चुके हैं। मंगलवार को भी 'नेशनल हेराल्ड' मामले में छापेमारी चल रही है। राजनीतिक जानकार रशीद किदवई यह बात स्वीकार करते हैं कि विपक्ष इस मुद्दे पर पूरी तरह से फेल रहा है। अब तो स्थिति ऐसी होती जा रही है कि छापों से पीड़ित राजनेताओं को अब जनता की सहानुभूति तक नहीं मिल रही। कहीं न कहीं, जनता में ये संदेश जा रहा है कि इन नेताओं ने भ्रष्टाचार किया है तो वे अब 'झेल' रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, देश में '75' जैसे हालात नहीं हैं। अभी मीडिया स्वतंत्र है। लोग अपनी बात कह सकते हैं। अगर कोई वैसे हालात बनाने का प्रयास करेगा तो उसे नतीजे भी वैसे ही भुगतने पड़ेंगे। इंदिरा गांधी को भारी खामियाजा उठाना पड़ा था। कांग्रेस पार्टी पर लगा वो दाग आज भी धुल नहीं सका है। आज के विपरित हालात में जयप्रकाश जैसे आंदोलनकारी भी तो नहीं हैं। विपक्ष की जो सरगर्मी दिखनी चाहिए, वह नहीं है। तटस्थ व्यक्तित्व का घोर अभाव हो चला है। यही वजह है कि विपक्ष, एकजुट नहीं हो पा रहा। इसे विपक्ष की नाकामी कहना ठीक नहीं होगा, बल्कि राजनीतिक तंत्र भ्रष्ट है, ये कहना सही रहेगा। राजनीतिक दलों के हजारों सक्रिय कार्यकर्ता होते हैं, उनका गुजारा कैसे चलता है। उन्हें वेतन तो मिलता नहीं, फिर भी काम करते हैं। शान में भी कहीं कोई कमी नहीं आती। रशीद किदवई ने कहा, अब राजनीतिक भ्रष्टाचार को लेकर कोई बड़ा जन आंदोलन भी नहीं हो रहा। न तो वीपी सिंह जैसी मुहिम कहीं दिख रही और न ही जेपी आंदोलन जैसा कुछ नजर आ रहा। निश्चित तौर पर मौजूदा माहौल का भाजपा को 2024 में फायदा मिलेगा। इसमें चाहे ईडी के छापे हों या तिरंगा यात्रा।
अगर भाजपा को यह भरोसा है कि वह आसानी से 2024 में वापसी कर रही है, तो फिर अब जांच एजेंसियों की अति सक्रियता के साथ ही अति राष्ट्रवाद का रंग क्यों बिखेरा जा रहा है। 'हर घर तिरंगा' अभियान को लेकर पीएम मोदी से लेकर भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ता तक जुटे हैं। आखिर ये उतावलापन किसलिए। किदवई के मुताबिक, जांच एजेंसी की मदद से जो राजनीतिक माइलेज मिल रहा है, कहीं वह अस्थायी तो नहीं है। क्या इसलिए तिरंगा यात्रा आयोजित की जा रही है। देश में महंगाई और बेरोजगारी जैसे अनेक मुद्दे हैं। क्या इनसे ध्यान हटाने के लिए राष्ट्रवाद की मदद ली जा रही है। इसी उतावलेपन में राज्य सरकारों पर बुरी नजर टिकाई जा रही है। '75' में आज के मुकाबले सूचना तंत्र बहुत कम था, लेकिन विपक्ष मजबूत था। आज सूचना तंत्र मजबूत है तो विपक्ष कमजोर पड़ रहा है। विपक्ष को आंखें खोलनी होंगी। उसे सोशल मीडिया की बजाए जनता के बीच उतरना होगा।
देश में 2014 के दौरान लोगों ने भाजपा को वोट क्यों दिया था। आर्थिक सुधार हुए हैं या नहीं। अगर हुए हैं तो सरकार को बेचैन नहीं होना चाहिए। किसान आंदोलन खत्म हो गया, मगर इसके बाद भी सरकार उन्हें लेकर बेचैन क्यों है। लोगों में कहीं सामाजिक बेचैनी नजर आ रही है। इन सबके बीच सरकार खुद को ऐसा दिखाना चाह रही है कि देश में 'राष्ट्रवाद' से परे कुछ नहीं है। अनेक राज्यों के सीमावर्ती इलाकों में अल्पसंख्यकों की आबादी ज्यादा है। वहां पहले तो कभी कोई मुसीबत नहीं आई। आज वहां क्यों डर पैदा किया जा रहा है। वे लोग पहले भी सुरक्षा बलों के मददगार रहे हैं आज भी हैं। भाजपा के उतावलेपन की एक वजह ये भी है कि उसे 2014 में लगभग 31 फीसदी वोट मिले थे। बाकी लोगों की क्या राय रही, इस पर विचार किया जाए। इसके बाद 2019 के चुनाव में वह प्रतिशत 38 हो गया। मतलब साफ है कि 50 फीसदी से ज्यादा लोगों ने भाजपा के राष्ट्रवाद पर मुहर नहीं लगाई।