प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), कोलकाता ने फेमा, 1999 की धारा 37 के तहत मैकनेली भारत इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (एमबीईसीएल) और उससे जुड़ी कंपनियों से जुड़े लोगों के ऑफिस व घरों पर छापेमारी की है। इस अभियान में संजय पसारी, राजीव पसारी, रवि टोडी और सुधीर सतनालीवाला के घर और जुड़ी हुई कंपनियों के ऑफिस शामिल हैं। यह कार्रवाई फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा), 1999 के कथित उल्लंघन के मामले में की गई है। तलाशी के दौरान, विदेशी मुद्रा के संदिग्ध लेन-देन सामने आए हैं, जिनकी जांच की जा रही है। इनमें एक्सपोर्ट से मिलने वाली वह बड़ी रकम भी शामिल है, जो एमबीईसीएल को नहीं मिली (सीआईआरपी से पहले के लेन-देन) और अभी तक भी बकाया है।
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ईडी के मुताबिक, इसके अलावा, ऐसी जानकारी मिली है जिससे पता चलता है कि भारत के बाहर मौजूद कुछ संपत्तियों पर संजय पसारी का कथित मालिकाना हक या कंट्रोल है, जिनके बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। फेमा, 1999 और अन्य लागू कानूनों के प्रावधानों के उल्लंघन का पता लगाने के लिए जांच जारी है। पता चला है कि एमबीईसीएल की आर्थिक स्थिति को जानबूझकर कमजोर किया गया था, जिसके कारण आखिरकार कंपनी को कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (सीआईआरपी) में ले जाना पड़ा।
सीआईआरपी के दौरान, लगभग 6,828 करोड़ रुपये के दावे किए गए थे, जिनमें से लगभग 5,015 करोड़ रुपये के दावों को स्वीकार किया गया। ये दावे 16 लेनदारों (क्रेडिटर्स) से जुड़े थे, जिसमें बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाला एक ग्रुप शामिल था। इस ग्रुप में अन्य पब्लिक सेक्टर बैंक, प्राइवेट सेक्टर बैंक और अन्य अनसिक्योर्ड और ऑपरेशनल लेनदार भी शामिल थे। इन देनदारियों के मुकाबले, केवल 441 करोड़ रुपये का रिज़ॉल्यूशन प्लान मंज़ूर किया गया। इसके चलते किए गए दावों की तुलना में लगभग 94 प्रतिशत की कमी आई।
खास बात यह है कि रिजॉल्यूशन प्लान में केवल 155 करोड़ रुपये कैश डालने की बात कही गई थी, जिसमें से असल में सिर्फ 123 करोड़ का भुगतान किया गया, जबकि बाकी रकम का भुगतान एमबीईसीएल की अपनी अंदरूनी कमाई से किया गया। जांच से पता चला था कि सीआईआरपी प्रोसेस के जरिए एमबीईसीएल के अधिग्रहण (एक्विजिशन) को इस तरह से तैयार किया गया था कि संजय पसारी के नेतृत्व वाले विश्व ग्रुप की असल आर्थिक भागीदारी और कंट्रोल को छिपाया जा सके। अधिग्रहण के लिए बीटीएल ईपीसी का इस्तेमाल रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट के तौर पर किया गया, जिसने अधिग्रहण के लिए एक एसपीवी (मंडल व्यापार प्राइवेट लिमिटेड) को नॉमिनेट किया।
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वहीं, अधिग्रहण के लिए फंड जुटाने के लिए विश्व ग्रुप से जुड़े फंड को कई कंपनियों के जरिए घुमाया गया, जिससे फंडिंग का असली सोर्स और रिजॉल्यूशन प्रोसेस का असली फायदा उठाने वाला व्यक्ति छिपा रहा। इसके अलावा, जांच से पता चला कि अधिग्रहण के लिए इस्तेमाल किए गए लगभग 105 करोड़ रुपये का फंड, संजय पसारी से जुड़ी कंपनियों से आए थे। इन्हें एनबीएफसी समेत कई बीच की कंपनियों के ज़रिए भेजा गया था। एजेंसी इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस व्यवस्था से फंड के स्रोत और अधिग्रहण के बाद एमबीईसीएल पर असली कंट्रोल को छिपाया गया था। क्या इससे 'इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016' की धारा 29ए की जरूरी शर्तों का उल्लंघन किया गया था।