कोरोना के संक्रमण को काबू करने के लिए देश में 50 दिन से लॉकडाउन लगा है और इसे आगे भी बढ़ाने के संकेत दिए गए हैं। इस बीच बुजुर्गों और बच्चों को लॉकडाउन में रहने की हिदायत दी गई है लेकिन ऐसे कब तक घर में बंद रहा जा सकता है ये कह पाना मुश्किल है।
एक अध्ययन में चौकाने वाली बात सामने आई है। अध्ययन के मुताबिक अगर लॉकडाउन आगे ऐसा ही रहा तो बुजुर्गों और बच्चों की परेशानी बढ़ने वाली है। अध्ययन में सलाह दी गई है कि बुजुर्गों और बच्चों को इस परेशानी से दूर करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साथ लाना जरूरी है।
ये शोध जर्नल ऑफ अमेरिकन जेरियाट्रिक सोसायटी में प्रकाशित हुआ है। इसमें कई शोधों का हवाला देते हुए कहा गया है कि अगर देश के बुजुर्गों और बच्चों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में दोनों के स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ सकता है। लंबे समय के लिए लगे लॉकडाउन से बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।
बुजुर्गों की याददाश्त पर गहरा असर पड़ेगा, नींद कम आने की वजह से उनके कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम और दिमाग पर भी असर पड़ सकता है। अध्ययन में कहा गया है कि बुजुर्गों और बच्चों को फोन या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दूसरे लोगों से अवगत कराना होगा। एम्स जेरियाट्रिक विभाग के डॉ.प्रसून चटर्जी और कर्नाटक के डॉ. संतोष के वाई ने यह रिपोर्ट तैयार की है।
नीति आयोग की गाइडलाइन
देश में 60 साल या इससे ज्यादा उम्र के 16 करोड़ लोगों के लिए नीति आयोग ने विशेष गाइडलाइन्स बनाई हैं। हैदराबाद में कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा रश्मि का कहना है कि इस समय बुजुर्गों में डिप्रेशन के मामले 18 से 24 फीसद तक बढ़े हैं।
जो बुजुर्ग अकेले या परिवार के साथ रहते हैं, उन्हें कोरोना के बारे में समझाने के साथ साथ सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनने और हाथ धोने के महत्व को बताने की जरूरत है।
डॉ. रश्मि के मुताबिक कई बुजुर्गों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग नया शब्द है इसलिए उन्हें बताएं कि किसी को छूने या करीब जाने से बचना जरूरी है। यदि आप माता-पिता से दूर रह रहे हैं, और वे अकेले हैं, तो उनसे बात करें। रोजाना उनसे बात करेंगे तो इससे उनका अकेलापन दूर होगा और उन्हें राहत मिलेगी।