फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

कोरोना वैक्सीन तैयार करने के लिए दुनियाभर की लैब में हो रहे हैं परीक्षण

न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Tue, 28 Apr 2020 02:39 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
कोरोना टेस्टिंग के लिए देश में 113 सरकारी लैब - फोटो : AMAR UJALA

पूरी दुनिया कोरोना वायरस को हराने के लिए वैक्सीन बनाने पर ज्यादा जोर दे रही है। वैक्सीन बनाना कोई आसान काम नहीं है, विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत अमेरिका भी यह मान चुका है कि कोरोना की वैक्सीन बनने में कम से कम डेढ़ से दो साल का समय लग सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी कहना है कि कोरोना से जंग तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक वैक्सीन का निर्माण ना हो जाए। ऐसे में हर देश के डॉक्टर और वैज्ञानिकों के लिए वैक्सीन बनाना प्राथमिकता बन जाता है। 



एक वैक्सीन को बनाने में काफी समय और पैसा लग जाता है। एक अनुमान के मुताबिक किसी महामारी की वैक्सीन बनाने के लिए प्री-क्लिनिकल स्टेज से बड़े पैमाने पर वैक्सीन के परीक्षण और फिर उत्पादन की लागत में 25-35 अरब रुपये का खर्चा आ जाता है।

देश में कोरोना टेस्टिंग के लिए कितनी लैब हैं
कोरोना वायरस की टेस्टिंग करने के लिए भारत में करीब 113 सरकारी लैब और लगभग 47 निजी लैब है। ये सभी प्रयोगशाला भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानि आईसीएमआर से स्वीकृत है। 

एक वैज्ञानिक ने जानकारी दी कि देश में चार बड़ी कंपनियां कोरोना वैक्सीन बनाने में जुटी हुई है। कोरोना को हराने के लिए देश में करीब 70 वैक्सीन की जांच चल रही हैं, जो अलग-अलग चरण में हैं।

विज्ञापन

कोरोना टेस्टिंग के लिए देश में 113 सरकारी लैब - फोटो : AMAR UJALA
पूरी दुनिया कोरोना वायरस को हराने के लिए वैक्सीन बनाने पर ज्यादा जोर दे रही है। वैक्सीन बनाना कोई आसान काम नहीं है, विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत अमेरिका भी यह मान चुका है कि कोरोना की वैक्सीन बनने में कम से कम डेढ़ से दो साल का समय लग सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का यह भी कहना है कि कोरोना से जंग तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक वैक्सीन का निर्माण ना हो जाए। ऐसे में हर देश के डॉक्टर और वैज्ञानिकों के लिए वैक्सीन बनाना प्राथमिकता बन जाता है। 

एक वैक्सीन को बनाने में काफी समय और पैसा लग जाता है। एक अनुमान के मुताबिक किसी महामारी की वैक्सीन बनाने के लिए प्री-क्लिनिकल स्टेज से बड़े पैमाने पर वैक्सीन के परीक्षण और फिर उत्पादन की लागत में 25-35 अरब रुपये का खर्चा आ जाता है।

देश में कोरोना टेस्टिंग के लिए कितनी लैब हैं
कोरोना वायरस की टेस्टिंग करने के लिए भारत में करीब 113 सरकारी लैब और लगभग 47 निजी लैब है। ये सभी प्रयोगशाला भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानि आईसीएमआर से स्वीकृत है। 

एक वैज्ञानिक ने जानकारी दी कि देश में चार बड़ी कंपनियां कोरोना वैक्सीन बनाने में जुटी हुई है। कोरोना को हराने के लिए देश में करीब 70 वैक्सीन की जांच चल रही हैं, जो अलग-अलग चरण में हैं।

जानवरों पर ही सबसे पहला परीक्षण क्यों होता है?

कोई भी वैक्सीन तीन या चार चरणों में ट्रायल से गुजरती है। सबसे पहले चरण में जानवरों पर ट्रायल किया जाता है, दूसरे चरण में किसी गंभीर रुप से ग्रसित मरीज पर, तीसरे चरण में स्वस्थ वॉलेंटियर्स और आखिरी चरण में सामान्य व्यक्ति पर टेस्ट किया जाता है। 

वैक्सीन का परीक्षण जानवरों में गिनी पिग, चूहे और खरगोश पर किया जाता है। इन जानवरों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता इंसानों जैसी होती है। दूसरा कारण यह है कि किसी वैक्सीन का टेस्ट करना जोखिमभरा होता है। जब जानवरों पर टेस्ट आशा के अनुरुप हो जाता है तब बाद में इंसानों पर इसका इस्तेमाल किया जाता है।

वॉलेंटियर को कैसे चुना जाता है?

वैक्सीन के ट्रायल के लिए इंसानों में गंभीर बीमारी से ग्रसित मरीजों को चुना जाता है और इसके बाद स्वैच्छाकर्मी पर इसका इस्तेमाल किया जाता है। किसी वॉलेंटियर की जांच करने से पहले उनकी लिखित अनुमति ली जाती है, जिसके बाद उनकी जांच होती है और ट्रायल किया जाता है।

वैक्सीन का ट्रायल करने के बाद अगर व्यक्ति में किसी तरह की कोई परेशानी आती है तो ट्रायल करने वाली कंपनी ही इलाज का पूरा खर्च उठाती है। ट्रायल की काफी सख्त प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है। मरीज की लगातार क्लीनिकल मॉनिटरिंग की जाती है जो ट्रायल करने वाली कंपनी ही करती है।

प्रयोगशाला से बाजार तक वैक्सीन पहुंचने का सफर 

सबसे पहले वैक्सीन को प्रयोगशाला में बनाया जाता है और उसके पूरे परीक्षण के बाद ही देश की सरकार को वैक्सीन के बारे में सूचित किया जाता है। सूचना मिलने पर सरकारी अधिकारी वैक्सीन के सभी मापदंडों की जांच करता है और स्वीकृति देता है।

किसी भी वैक्सीन को कोल्ड चैन में कड़ी सुरक्षा के बीच रखा जाता है। हजारों लोगों पर सफल होने के बाद अमेरिका की एफडीए यानि कि फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन वैक्सीन के मापदंड जांचता है। जिसके बाद ही कोई भी वैक्सीन बाजार में आने के लिए तैयार मानी जाती है। अमेरिका की एफडीए की गाइडलाइन का ज्यादातर देश पालन करते हैं।

पहला वैक्सीन कब बना?

दुनिया की सबसे पहली बीमारी चेचक थी, जिसके टीके की खोज हुई। विदेशी चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने साल 1796 में चेचक का टीका खोजा। इसके अलावा रेबीज की वैक्सीन का पहला परीक्षण लुई पाश्चर ने 1885 में किया था।

ट्रायल के परिणाम गोपनीय रखे जाते हैं
कोरोना की वैक्सीन बनने में अभी समय लगने वाला है। अभी तक कोरोना को लेकर जितने परीक्षण हो रहे हैं उनके सफल परिणाम नहीं आ रहे हैं। जब तक सफल परिणाम नहीं आ जाते तब तक परिणामों को गोपनीय रखा जाता है। 

इस समय पूरे विश्व में कोरोना वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है। जहां कोरोना से पीड़ित मरीज पर ट्रायल किया गया है वहां ट्रायल के सफल होने का दावा भी किया गया है। हालांकि जानकार मानते हैं कि कोरोना की वैक्सीन बनने में कम से कम डेढ़ साल का समय लग जाएगा।

प्लाज्मा थेरैपी क्या है?

अगर कोई कोरोना से पीड़ित मरीज ठीक हो जाता है तो उसका प्लाज्मा निकालकर गंभीर रोगी के शरीर में डाल दिया जाता है। यानि कि ठीक हुए मरीज का खून जो कि एक एंटीबॉडी में समृद्ध, गंभीर रुप से पीड़ित मरीज के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 

इस थेरैपी में एंटीबॉडी का इस्तेमाल किया जाता है जो कि किसी वायरस या बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ने के लिए शरीर में बनता है। ऐसा करने से बीमार मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है। प्लाज्मा खून का एक तरल हिस्सा होता है जो पानी और प्रोटीन का बना होता है।

प्लाज्मा लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स को शरीर के माध्यम से प्रसारित करने के लिए एक माध्यम प्रदान करता है। इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता के महत्वपू्र्ण घटक भी होते हैं जिन्हें एंटीबॉडी के रुप में जाना जाता है।

कितने तरह की होती हैं एंटीबॉडी?

एंटीबॉडी दो तरह की होती है, आईजीएम और आईजीजी। पहली स्टेज में अगर मरीज को कोरोना या कोई दूसरा इंफेक्शन हुआ है तो मरीज की शरीर उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी खुद बनाता है। 
आईजीएम एंटीबॉडी इंस्ट्रक्शन के लिए होती है तो आईजीजी एंटीबॉडी प्रोटेक्टिव होती है। यह कई सालों तक रुबेला, पोलियो जैसी बीमारियों से सुरक्षा करती है। 

वैक्सीन बनाने पर अमेरिका ने झोंकी ताकत
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ समय पहले एलान किया था कि अमेरिका कोरोना वैक्सीन बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेगा। अपनी प्रयोगशाला में वैक्सीन बनाने के लिए ट्रंप ने 1 बिलियन डॉलर यानि कि 6,500 करोड़ रुपये खर्च करने का एलान किया था।

इसके अलावा ब्रिटेन ने वैक्सीन के लिए करीब 187 करोड़ रुपये खर्च करने का एलान किया है। चीन, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देश भी वैक्सीन के शोध में करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं।

कब और कहां हुए शुरुआती अहम टेस्ट?

  • 17 मार्च 2020 को अमेरिका में इंसान पर वैक्सीन का ट्रायल करना शुरू कर दिया था। चीन ने भी इसी दिन वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल शुरू कर दिया था। 
  • 2 अप्रैल 2020 को ऑस्ट्रेलिया ने जानकारी दी कि वह महामारी से निपटने के लिए दो वैक्सीन का परीक्षण कर रहा है।
  • मार्च 2020 में हैदराबाद विश्वविद्यालय का दावा किया कि कोरोना से निपटने के लिए टी सेल एपिटोप्स टीका बनाया गया है, जिसे टेस्टिंग के लिए भेज दिया गया है और इसके परिणाम सामने आने का इंतजार है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next