तख्त के जत्थेदार कुलवंत सिंह और उनके सहयोगियों ने शुक्रवार को 'गुरमत' (एडवायजरी) की घोषणा की। नांदेड़ के स्थानीय गुरुद्वारों द्वारा इस गुरमत को अपनाए जाने की उम्मीद है। एडवायजरी में कहा गया है कि पारंपरिक सलवार-कमीज को प्राथमिकता देने की जड़ें इस बात पर आधारित हैं कि बड़े आकार के लहंगे दुल्हनों को समारोह के दौरान ठीक से बैठने, खड़े होने और पूजा करने में बाधा बनते हैं।
शादियों में अनावश्यक खर्ज कम करने की सलाह
एडवायजरी में समारोह की पवित्रता बनाए रखने के लिए शादियों में अनावश्यक खर्च को कम करने पर भी जोर दिया गया है। नांदेड़ के हजूर साहिब के प्रशासक विजय सतबीर सिंह ने कहा, 'गुरमत नांदेड़ में स्थानीय गुरुद्वारों के लिए आचार संहिता के रूप में काम करता है। इसके अलावा, गुरमत को अमृतसर में अकाल तख्त सहित शेष चार तख्तों द्वारा अपनाए जाने की संभावना है।
गंतव्य शादियों में गुरु ग्रंथ साहिब ले जाने के खिलाफ आदेश
अकाल तख्त ने अक्टूबर में गुरुद्वारों के बाहर गंतव्य (अपनी पसंद की जगहों पर) शादियों में गुरु ग्रंथ साहिब को ले जाने के खिलाफ एक हुकुमनामा (आदेश) जारी किया था। आदेश में गुरुद्वारों के भीतर पारंपरिक सिख समारोह आयोजित करने पर जोर दिया गया है, जहां दंपति गुरु ग्रंथ साहिब की परिक्रमा करते हुए अपनी प्रतिज्ञा लेते हैं।
शादी कार्ड पर 'सिंह' और 'कौर' को शामिल करने पर जोर
नांदेड़ में 'तख्त सचखंड श्री हजूर अचलनगर साहिब' के हालिया गुरमत में शादी के कार्ड पर 'सिंह' और 'कौर' को शामिल करने पर जोर दिया गया है और उन्हें सिख शिक्षाओं के अनुसार प्रत्यय के रूप में शामिल करने की वकालत की गई है। इसके अलावा, गुरमत में शादी समारोह के लिए गुरुद्वारे में प्रवेश के दौरान दुल्हन के सिर पर फूलों से बने 'छत्र' या रिश्तेदारों द्वारा ले जाए जाने वाले दुपट्टे के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई गई। इस आपत्ति के पीछे तर्क यह है कि एक 'छत्र' के तहत कोई और अंदर नहीं जा सकता है क्योंकि गुरुद्वारा एक ऐसा स्थान है जहां पवित्र ग्रंथ सर्वोच्च महत्व रखता है।