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बोफोर्स के बाद गांधी व बच्चन परिवार में बढ़ती गई दूरी...

Sun, 19 May 2019 05:25 AM IST
गौरव द्विवेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • मोदी को घेरने के बहाने प्रियंका के अमिताभ का नाम लेने के बाद तलाशे जा रहे मायने
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गांधी परिवार के बीच अमिताभ बच्चन (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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करीब दो दशक से गांधी और बच्चन परिवार के रिश्तों में चली आ रही खटास की चर्चाओं के बीच लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की जुबां पर महानायक अमिताभ बच्चन का नाम आने के मायने तलाशे जा रहे हैं। प्रियंका ने मिर्जापुर में शुक्रवार को पीएम नरेंद्र मोदी को दुनिया का सबसे बड़ा अभिनेता बताते हुए कहा था, इससे अच्छा तो आप अमिताभ बच्चन को ही प्रधानमंत्री बना देते। करना तो किसी ने कुछ नहीं था आपके लिए प्रियंका के इस बयान ने सालों पुराने रिश्तों की उन परतों को खोल दिया जो काफी दिनों से दबी हुई थीं। 

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बच्चन और गांधी परिवार का रिश्ता दशकों पुराना है। अमिताभ और पूर्व पीएम दिवंगत राजीव गांधी की दोस्ती किसी से छुपी नहीं है। हालांकि एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्रियंका ने अमिताभ से आशीर्वाद लेकर ही सियासी पारी शुरू की है।

बहरहाल, दोनों परिवारों की दोस्ती तब शुरू हुई, जब गांधी परिवार इलाहाबाद में आनंद भवन में रहता था। दोनों परिवारों की कड़ी बनी थीं स्वर कोकिला सरोजिनी नायडू। उन्होंने ही हरिवंश राय बच्चन और उनकी पत्नी तेजी का परिचय जवाहर लाल नेहरू से करवाया था। उस वक्त इंदिरा गांधी की शादी नहीं हुई थी। मुलाकातों के दौर के बाद दोनों परिवारों के रिश्ते गाढ़े होते गए। इंदिरा की शादी के बाद जब राजीव पैदा हुए तो उम्र में दो साल बड़े अमिताभ बच्चन से उनकी दोस्ती हुई। धीरे-धीरे यह दोस्ती और परवान चढ़ी। 
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पीएम रहते नेहरू नई दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में रहते थे। इस भवन में अमिताभ, उनके भाई अजिताभ और राजीव व उनके भाई संजय एक साथ खेला करते थे। कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान 1983 में जब अमिताभ गंभीर रूप से घायल हुए तो प्रधानमंत्री इंदिरा उनका हालचाल पूछने अस्पताल भी गईं। कहा जाता है कि राजीव से शादी से पहले सोनिया भारत आईं तो इंदिरा ने उनके ठहरने का इंतजाम बच्चन परिवार के साथ किया ताकि सोनिया को हिंदुस्तानी संस्कार सीखने में आसानी हो।

प्रगाढ़ रिश्तों में दरार की शुरुआत इमरजेंसी में हुई। इंदिरा के कठोर नियम-कायदों का असर बॉलीवुड पर भी पड़ा। अमिताभ खामोश रहे तो उनकी आलोचना भी शुरू हो गई। तब उन्होंने गांधी परिवार से कुछ दूरी बनानी शुरू कर दी। इंदिरा की हत्या के बाद सियासत में उतरे राजीव गांधी के कहने पर अमिताभ भी राजनीति में कूदे। इलाहाबाद से दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया। 

इस बीच, बोफोर्स घोटाले में उनका नाम भी उछला तो उन्होंने सांसदी से इस्तीफा दे दिया। फिर, पलटकर राजनीति की तरफ नहीं देखा। कहा जाता है कि 1991 में राजीव की हत्या के बाद सोनिया को बच्चन परिवार से सहारे की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली। बाद में 1997 में प्रियंका व रॉबर्ट वाड्रा की शादी की तारीख और अमिताभ की बेटी श्वेता की शादी की तारीख एक दिन आगे-पीछे होने के लेकर भी रिश्ते बिगड़ने की चर्चा हुई। स्थिति ऐसी हुई कि 2007 में अमिताभ की मां के अंतिम संस्कार में गांधी परिवार से कोई सदस्य शामिल नहीं हुआ।

मोदी के भी करीबी रहे अमिताभ 
अमिताभ गांधी परिवार से दूर होने के बाद अमर सिंह के जरिए सपा के करीब आए। जया बच्चन आज भी सपा से राज्यसभा सांसद हैं। अमिताभ ने नरेंद्र मोदी के गुजरात सीएम रहने के दौरान राज्य के ब्रांड अंबेसडर के तौर पर विज्ञापन किया। मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में भी अमिताभ की खास मौजूदगी देखने को मिली थी।

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