झारखंड की जिन तीन सीटों पर रविवार को चुनाव होना है, उनमें से दो सीटें राजहमल और दुमका क्षेत्रीय पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास हैं, वहीं गोड्डा भाजपा के पास है। राज्य में दोनों महागठबंधन अपनी अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।
दुमका : शिबू का विजय रथ रोक पाएंगे सोरेन?
दुमका में आदिवासी समाज के लोगों का बोलबाला रहा है। इनमें मुंडा, कोड़ा, सोरेन प्रमुख रहे हैं। 1989 से यह सीट झारखंड मुक्ति मोर्चा के गढ़ के तौर पर देखी जाती है। 1998 और 1999 में बाबूलाल मरांडी की जीत के बाद जेएमएम के शिबू सोरेन यहां से लगातार जीतते चले आ रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद शिबू सोरेन ने भाजपा के सुनील सोरेन को हराया था। 2009 में भी शिबू सोरेन ने भाजपा के सुनील सोरेन को हरा चुके हैं। शिबू सोरेन एक बार फिर से यहां से ताल ठोक रहे हैं और उनके मुकाबले भाजपा ने फिर से पिछले दो बार से हारते आ रहे सुनील सोरेन को उतारा है।
राजमहल : आदिवासी जिसकी ओर राजमहल उसका
राजमहल पर हार-जीत की ‘चाबी’ आदिवासी-अल्पसंख्यक वोटरों के हाथों में है। 2014 में यहां झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के विजय कुमार हंसदक ने भाजपा के हेमलाल मुर्मू को हराया था। तब झामुमो, कांग्रेस और राजद साथ चुनाव लड़े थे। इस बार झाविमो भी महागठबंधन में है। वर्तमान सांसद झामुमो प्रत्याशी विजय हंसदक और भाजपा के हेमलाल में कड़ा मुकाबला है। भाजपा को आजसू, लोजपा व जदयू का साथ मिल रहा है। झामुमो व भाजपा की टक्कर में तृणमूल कांग्रेस की मोनिका किस्कू ‘फैक्टर’ बन चुकी हैं। माकपा प्रत्याशी गोपिन सोरेन भी अपने कैडर वोटों पर भरोसे है।
गोड्डा : गैर यादव-मुसलमानों की गोलबंदी पर टिकी जीत
गोड्डा संसदीय क्षेत्र में सर्वाधिक मुसलमान और यादव मतदाता हैं, जिसे महागठबंधन का आधार वोट माना जाता है। इस बार किसी मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार के नहीं होने के कारण महागठबंधन को अपर हैंड है, पर भाजपा इसे शैडो अपर हैंड मान रही है। उसका मानना है कि गैर यादव-मुसलमानों की गोलबंदी उसके पक्ष में जाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में निशिकांत दुबे ने 3.80 लाख मत पाकर कांग्रेस के फुरकान अंसारी को हराया था। इस बार फुरकान अंसारी चुनाव में नहीं हैं। भाजपा के निशिकांत दुबे और जेवीएम प्रत्याशी प्रदीप यादव के बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है।