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सुप्रीम कोर्ट: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून को चुनौती, डीएनपीए बोला- ऐसा हुआ को बंद हो जाएंगे न्यूजरूम

Tue, 27 Oct 2026 09:30 AM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

डिजिटल डेटा संरक्षण कानून को चुनौती देते हुए डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पत्रकारों को खबर प्रकाशित करने से पहले लोगों की अनुमति लेनी पड़ी, तो न्यूजरूम का कामकाज ठप हो सकता है। अदालत ने केंद्र के दो मंत्रालयों को नोटिस जारी किया, लेकिन कानून पर तत्काल रोक नहीं लगाई। आखिर इस कानून में पत्रकारिता को क्या छूट नहीं मिली है? क्या इससे खोजी पत्रकारिता और जनता के जानने के अधिकार पर असर पड़ेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) कानून और उसके नियमों को लेकर डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि अगर पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर प्रकाशित करने से पहले उससे अनुमति लेनी पड़ी, तो खोजी पत्रकारिता और समाचारों की रिपोर्टिंग करना मुश्किल हो जाएगा। इससे न्यूजरूम का कामकाज प्रभावित हो सकता है और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी असर पड़ेगा। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार के दो मंत्रालयों को नोटिस जारी किया। हालांकि, अदालत ने सरकार का पक्ष सुने बिना कानून पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।

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डीएनपीए ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी?
डीएनपीए की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह पारंपरिक मीडिया संस्थानों की ओर से दायर एक व्यापक याचिका है। उनका तर्क था कि पत्रकारों को किसी व्यक्ति की जानकारी प्रकाशित करने से पहले उसकी सहमति लेने के लिए बाध्य करना खबर जुटाने और उसे प्रकाशित करने के तरीके को बदल देगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई खबर गलत या तथ्यहीन होती है, तो उसके लिए पत्रकार और प्रकाशक को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। लेकिन हर खबर से पहले संबंधित व्यक्ति की अनुमति लेना पत्रकारिता के कामकाज को प्रभावित करेगा। डीएनपीए ने इस मामले में अंतरिम राहत देने की मांग भी की।

कानून में पत्रकारिता को छूट नहीं मिलने से क्या परेशानी है?
डीएनपीए का कहना है कि डेटा संरक्षण कानून और उसके नियमों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। याचिका के मुताबिक, इससे पत्रकारों, संपादकों और समाचार प्रकाशकों पर ऐसे नियम लागू हो सकते हैं, जो स्वतंत्र पत्रकारिता के कामकाज से मेल नहीं खाते। कानून के तहत व्यक्तिगत जानकारी के इस्तेमाल में नोटिस देने, सहमति लेने, सहमति वापस लेने और डेटा मिटाने जैसी शर्तें लागू हो सकती हैं। एसोसिएशन का तर्क है कि भ्रष्टाचार, गड़बड़ी या सार्वजनिक मामलों में अनियमितताओं की जांच करते समय पत्रकारों को उन लोगों की निजी जानकारी जुटानी पड़ सकती है, जिनके कामकाज की जांच की जा रही है। ऐसे मामलों में पहले अनुमति लेना खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर सकता है और खबरों के स्रोतों की गोपनीयता भी खतरे में पड़ सकती है।
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आरटीआई कानून में बदलाव और संविधान के किन प्रावधानों को चुनौती दी गई?
डीएनपीए ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के कई प्रावधानों और उससे जुड़े नियमों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। याचिका में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 8(1)(j) में किए गए बदलाव को भी चुनौती दी गई है। यह प्रावधान सरकारी प्राधिकरणों के पास मौजूद व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे से जुड़ा है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g) और 21 का हवाला दिया गया है। ये समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पेशा करने के अधिकार और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित हैं। डीएनपीए ने अधिनियम की धारा 36 और 37 के साथ नियम 23 तथा सातवीं अनुसूची को भी चुनौती दी है। एसोसिएशन का कहना है कि केंद्र को डेटा से जुड़ी जानकारी मांगने की शक्ति देने वाले प्रावधानों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से क्या कहा और अगली सुनवाई कब होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने कानून एवं न्याय मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने कहा कि दूसरे पक्ष को सुने बिना कानून पर रोक नहीं लगाई जा सकती। हालांकि, अंतरिम रोक की मांग पर भी नोटिस जारी किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी, जिसमें इससे जुड़े पहले से लंबित मामलों पर भी सुनवाई की जाएगी। डीएनपीए में रिलायंस समूह और अडानी समूह की कंपनियों सहित 21 डिजिटल समाचार प्रकाशक शामिल हैं। इसके सदस्यों में नेटवर्क18, एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट, द हिंदू, इंडिया टुडे, जी मीडिया, एबीपी, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, अमर उजाला और ईनाडु टेलीविजन जैसे संस्थान शामिल हैं। याचिका में केएस पुट्टस्वामी मामले के फैसले का भी हवाला दिया गया है, जिसमें निजता को मौलिक अधिकार माना गया था। डीएनपीए का तर्क है कि डेटा की सुरक्षा के साथ प्रेस की स्वतंत्रता और जनता के जानने के अधिकार का भी संरक्षण होना चाहिए।

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