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डिजिटल अरेस्ट: वीडियो कॉल पर दिखाया रासुका का डर, वसूले 2.12 करोड़, बेचने पड़े म्यूचुअल फंड/शेयर

Wed, 07 Oct 2026 07:51 PM IST
राहुल कुमार डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
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साइबर फ्रॉड - फोटो : amar ujala
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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), गुवाहाटी जोनल ऑफिस-I ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (पीएमएलए), 2002 के तहत एक प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया है। इसके तहत, गुवाहाटी के एक सीनियर सिटिजन के साथ 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए किए गए साइबर फ्रॉड के मामले में, एक्सिस बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, फेडरल बैंक, इंडसइंड बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में मौजूद 43 बैंक अकाउंट्स में जमा कुल लगभग 2.12 करोड़ रुपये की राशि को अस्थायी रूप से जब्त (अटैच) किया गया है।

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ईडी ने यह जांच साइबर पुलिस स्टेशन, सीआईडी असम, द्वारा अज्ञात साइबर फ्रॉड करने वालों के खिलाफ 'भारतीय न्याय संहिता', 2023 और 'इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट', 2000 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की थी। सितंबर और दिसंबर 2025 के बीच, साइबर ठगों ने ट्राई, मुंबई क्राइम ब्रांच और सीबीआई के अधिकारी बनकर गुवाहाटी के एक बुजुर्ग से संपर्क किया। 

उन्होंने बुजुर्ग को झूठा यकीन दिलाया कि उनके आधार कार्ड से खुले एक बैंक खाते का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। वीडियो कॉल के ज़रिए उन्हें तथाकथित "डिजिटल अरेस्ट" में रखा। उन्हें अदालत की बनावटी कार्यवाही और एक नकली "डिजिटल अरेस्ट वारंट" दिखाया गया। हर दो घंटे में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए मजबूर किया गया। 
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धमकी दी गई कि अगर उन्होंने किसी को इस मामले के बारे में बताया तो उन्हें नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत हिरासत में ले लिया जाएगा। परिवार के फंड की "आरबीआई जांच" और बाद में एक नकली "बेल बॉन्ड" के बहाने, पीड़ित को ठगों द्वारा बताए गए बैंक खातों में 19 बार में कुल लगभग 2.13 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। इसके लिए उन्होंने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट, म्यूचुअल फंड और शेयर बेच दिए और अपने पेंशन खाते व इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन भी लिया। आगे की जांच से पता चला है कि जबरन वसूली गई रकम पहले 'म्यूल' अकाउंट्स में जमा की गई थी। 

तुरंत ही इसे देश भर में मौजूद लोगों, फर्मों और कंपनियों के कई बैंक अकाउंट्स में बांटकर ट्रांसफर कर दिया गया था। इसके बाद, पैसे के रास्ते (ट्रेल) को छिपाने के लिए बहुत सोच-समझकर और व्यवस्थित तरीके से इस रकम को कैश में निकाला गया। उसे डिजिटल करेंसी में बदल कर पेमेंट गेटवे में ट्रांसफर किया गया। दूसरे अकाउंट्स में भेजा गया। इन अकाउंट्स में हुए ट्रांज़ैक्शन, अकाउंट होल्डर्स की बताई गई प्रोफाइल से बिल्कुल अलग थे, जिससे पता चलता है कि साइबर फ्रॉड सिंडिकेट 'म्यूल' अकाउंट्स का एक संगठित नेटवर्क चला रहा था। पैसे के लेन-देन के रास्ते का पता लगाकर, ईडी ने 43 ऐसे बैंक अकाउंट्स की पहचान की, जिनके जरिए अपराध से मिली रकम को घुमाया गया था। 

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