मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान के अंतर्गत संचालित संस्थाओं की मान्यता जून 2017 में ही स्थगित हो गई थी। तीन वर्षों से संस्था को फंड रोक दिया गया था। इसके बावजूद न संस्था का संचालन रुका और न ही वहां लड़कियों को भेजने का सिलसिला थमा।
घर से भागी या गुमशुदा हाल में मिली लड़कियों को पुलिस खुद इसी संस्था में शरण दिलाती थी। संस्था के रिकार्ड की मानें तो पिछले तीन वर्षों में स्वाधार गृह व बालगृह में 707 लड़कियों को पहुंचाया गया, जिन्हें बाद में परिवार के पास भेज दिया गया। हर तरफ यही सवाल है कि संस्था की मान्यता न होने की बात जानते हुए भी अफसर लड़कियों को यहीं क्यों भेजते थे। इससे बड़ा सवाल, लड़कियां आती थीं तो बिना फंड उनका भरण-पोषण कैसे होता था।
प्रदेश में हुए पालना घोटाला की सीबीआई जांच में मां विंध्यवासिनी संस्था का नाम भी आने के बाद महिला बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव रेणुका कुमार ने संस्था को मिलने वाली सरकारी मदद पर रोक लगा दी थी। इसके बाद जून 2017 में संस्था की मान्यता को भी स्थगित करते हुए यहां मौजूद सभी बच्चों को गोरखपुर और बलिया के केंद्रों में शिफ्ट करने के निर्देश हुए। जिम्मेदारों की अनदेखी के बावजूद संचालिका ने मनमाने ढंग से सभी संस्थाओं का संचालन जारी रखा। विभागीय अफसर सिर्फ पत्र लिखने तक सिमटे रहे।