इसके बाद एक वक्त ऐसा भी आया जब अधिकारी के जवाब के इंतजार में करीब 15 मिनट तक पीठ को इंतजार करना पड़ा। इस पर एएसजी ने पीठ से माफी मांगी। इस बात से नाराज पीठ ने कहा कि ‘डू नॉट बी सॉरी’। नादकर्णी ने कहा कि अगर अफसरों ने समय पर काम पूरा किया होता तो आज यह नहीं होता।
कोर्ट ने यह भी कहा, ‘आप अपने अधिकारियों की क्षमता देखिए। इन्हें जानकारी तक नहीं मिल पा रही है। इसलिए दिल्ली ऐसी है। आपको डाटा को अंतिम रूप देने में महीने लग जाते हैं और उसके बाद विश्लेषण करने में और कुछ महीने। इसके बाद कारण बताओ नोटिस जारी किया जाता जाएगा और उसके बाद कार्रवाई होगी। ऐसे में तो दिल्ली ध्वस्त हो जाएगी। तब आप कहेंगे कि अब याचिका का कोई मतलब नहीं रह गया है। पीठ ने एएसजी को शुक्रवार को इस संबंध में निर्देश लाने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दोहराया कि सीलिंग या अवैध निर्माण पर कार्रवाई के लिए 48 घंटे का नोटिस क्यों दिया जाना चाहिए। केंद्र सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की ओर से कहा गया कि नोटिस देना जरूरी है, क्योंकि दस्तावेजों की जांच करनी होती है। बिना दस्तावेजों की जांच के कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
इसके बाद पीठ ने कहा, ‘2006 में सुप्रीम कोर्ट ने रिहायशी इलाके में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों को बंद करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब तक डीडीए और निगम सुस्त है। आप दावा कर रहे हो कि उनके पास लाइसेंस है। लाइसेंस तो एक पन्ने का होता है। ऐसे में कार्रवाई में देरी करने का क्या कारण है।’ डीडीए की ओर से पेश एएसजी पीएस नरसिंहा ने कहा कि बिना दस्तावेजों को वेरिफाई किए कार्रवाई कैसे की जा सकती है। यही कारण है कि 48 घंटे का वक्त दिया जाता है।