समस्या इसलिए विकराल
रिपोर्ट के अनुसार, चुनौती इसलिए विकराल है, क्योंकि दिल्ली-एनसीआर और सिंधु-गंगा का मैदान भौगोलिक रूप से ऐसा विशाल क्षेत्र है, जहां हवा की गुणवत्ता खराब होने पर उसका फैलाव नहीं हो पाता। उत्तर भारत का 8 राज्यों में फैला करीब 7,00,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सर्दियों में ठंडी और स्थिर हवा की वजह से प्राकृतिक वायु-पकड़ और वायु फांसाव क्षेत्र (नेचुरल एयर बेसिन और कन्फाइनमेंट) क्षेत्र बन जाता है। इसी भू-भाग में करीब 50 करोड़ से अधिक आबादी, जो विश्व के सबसे घने आबादी समूहों में है, शहरीकरण और संसाधनों पर तीव्र दबाव डालती है।
यही कारण है, जब वायु में एनओएक्स, एसओ2, एनएच3 और वीओसी जैसे प्रदूषक मिलते हैं तो हवा के रुकने और तापमान-उलटाव (इन्वर्जन) के कारण इनके फैलने के बजाय एक ही क्षेत्र में जमा होती चली जाती है। जिससे रासायनिक प्रदूषण अचानक और खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है।
सीजनल प्रदूषण नहीं स्वास्थ्य आपातकाल
हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के साथ अध्ययन के अनुसार, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व बिहार के शहरी क्षेत्र के लोगों में सूक्ष्म कार्बन अवशेष फेफड़ों, रक्त और गर्भनाल तक पहुंचते मिले हैं। प्रदूषण-संबंधी मौतों में 30% हृदयाघात व स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर का जोखिम 5 से 7 गुना ज्यादा, बच्चों में निमोनिया व श्वसन-संक्रमण में 42% वृद्धि, गर्भवतियों में कम जन्म-वजन और प्री-टर्म डिलीवरी के मामलों में इजाफा हुआ।
वायु सुधार की समयसीमा तय करना राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर
डब्ल्यूएचओ एयर क्वालिटी टास्क-फोर्स के प्रो. जेम्स बेलिंगर का कहना है, हमने बीजिंग को 10 वर्षों में बदला और लॉस-एंजिलिस को 25 वर्षों में। उत्तर भारत 7 वर्षों में चमत्कार कर सकता है, आवश्यकता राजनीतिक इच्छा-शक्ति व समन्वय की है। हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की प्रदूषण विशेषज्ञ डॉ. मारला डायसन कहती हैं, वायु प्रदूषण को सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा बताना गलत है।
- यह बच्चों, बुजुर्गों और कार्यशील आयु-समूह के लिए धीमी मौत का खतरा है, इसलिए इसके खिलाफ चरणबद्ध तरीके से ठोस कार्रवाई होनी चाहिए और एक उच्चाधिकार प्राप्त निगरानी समिति इस पर नजर रखे।
- कैलिफोर्निया एयर रिसोर्स बोर्ड के डॉ. स्टीवन कारपेंटर का कहना है, कड़े नियम टेक्नोलॉजी के दुश्मन नहीं बल्कि, नई टेक्नोलॉजी को तेजी से विकसित होने और अपनाने के लिए मजबूर करते हैं।
- क्षेत्रीय नीति मॉडलिंग पर इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस (आईआईएएसए) से जुड़े डॉ. मेई लिंग स्पष्ट रूप से कहते हैं, उत्तर भारत को सुधारने के लिए सबसे पहला कदम अलग-अलग राज्यों की नीतियों को समाप्त कर एकीकृत क्लीन-एयर सिस्टम लागू करना जरूरी है।
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परिवहन और उद्योगों का बोझ
इस संकट को और गंभीर बनाता है क्षेत्र पर परिवहन और उद्योगों का अत्यधिक बोझ। अकेले दिल्ली-एनसीआर में 1 करोड़ 25 लाख से अधिक पंजीकृत वाहन और पूरे गंगात्मक क्षेत्र में 3 करोड़ से अधिक चालू वाहन एनओएक्स और वीओसी के सबसे बड़े स्रोत हैं। औद्योगिक क्लस्टरों की संख्या 12,000 से अधिक है, जिनमें से हजारों इकाइयां ऊर्जा के पारंपरिक ईंधन मॉडल पर निर्भर हैं। धान कटाई के मौसम में अमोनिया व बायोमास उत्सर्जन बढ़ता है, जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं को और तेज कर देता है।