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दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं पर CAG रिपोर्ट में क्या?: सात बिंदुओं में जानें बड़ी कमियां, फंड्स न खर्चने पर सवाल

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 01 Mar 2025 08:33 PM IST

सार

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट दिल्ली विधानसभा में पेश होने के बाद लगातार चर्चा में है। आखिर दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर रिपोर्ट में क्या खुलासे हुए हैं? इसमें दवाओं की कमी को लेकर क्या कहा गया है? इसके अलावा कोरोनावायरस महामारी के दौरान दिल्ली सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर क्या सामने आया है? रिपोर्ट में मोहल्ला क्लीनिक को लेकर क्या कहा गया है? इसके अलावा अस्पतालों और डॉक्टरों की सुविधाओं को लेकर क्या खुलासे हुए हैं? आइये जानते हैं...
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दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं पर सीएजी रिपोर्ट में बड़े खुलासे। - फोटो : अमर उजाला
दिल्ली विधानसभा में शुक्रवार को स्वास्थ्य मंत्री पंकज कुमार सिंह ने राजधानी में स्वास्थ्य सेवाओं के हाल को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट पेश की। इसमें कई अहम खुलासे हुए हैं। मसलन- सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों और मेडिकल अफसरों के खाली पड़े पद, आदि। इन आरोपों को लेकर दिल्ली की भाजपा सरकार ने 12 साल तक दिल्ली पर शासन करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर हमला बोला है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर रिपोर्ट में क्या खुलासे हुए हैं? इसमें दवाओं की कमी को लेकर क्या कहा गया है? इसके अलावा कोरोनावायरस महामारी के दौरान दिल्ली सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर क्या सामने आया है? रिपोर्ट में मोहल्ला क्लीनिक को लेकर क्या कहा गया है? इसके अलावा अस्पतालों और डॉक्टरों की सुविधाओं को लेकर क्या खुलासे हुए हैं? आइये जानते हैं...
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दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं पर सीएजी रिपोर्ट में बड़े खुलासे। - फोटो : अमर उजाला
दिल्ली विधानसभा में शुक्रवार को स्वास्थ्य मंत्री पंकज कुमार सिंह ने राजधानी में स्वास्थ्य सेवाओं के हाल को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट पेश की। इसमें कई अहम खुलासे हुए हैं। मसलन- सरकारी अस्पतालों में दवाओं की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों और मेडिकल अफसरों के खाली पड़े पद, आदि। इन आरोपों को लेकर दिल्ली की भाजपा सरकार ने 12 साल तक दिल्ली पर शासन करने वाली आम आदमी पार्टी (आप) सरकार पर हमला बोला है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर रिपोर्ट में क्या खुलासे हुए हैं? इसमें दवाओं की कमी को लेकर क्या कहा गया है? इसके अलावा कोरोनावायरस महामारी के दौरान दिल्ली सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर क्या सामने आया है? रिपोर्ट में मोहल्ला क्लीनिक को लेकर क्या कहा गया है? इसके अलावा अस्पतालों और डॉक्टरों की सुविधाओं को लेकर क्या खुलासे हुए हैं? आइये जानते हैं...

दिल्ली में कब से कब तक की स्वास्थ्य सेवाओं का बताया हाल?
सीएजी ने जो रिपोर्ट जारी की है, वह 2016-17 से लेकर 2021-22 के बीच दिल्ली के सार्वजनिक स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन को लेकर किए गए ऑडिट पर आधारित हैं। इसमें स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर की मौजूदगी, मैनपावर, आर्थिक संसाधनों की मौजूदगी और सरकार की दिल्ली की स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन की क्षमता का जिक्र है। 

रिपोर्ट में 2016 से लेकर 2022 तक के ऑडिट की जानकारी मौजूद है। इसमें अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और सार्वजनिक हेल्थकेयर स्कीम्स की अक्षमताओं पर भी गौर किया गया है। इसमें कहा गया है कि दिल्ली की पिछली सरकार की तरफ से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के कार्यक्रमों के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जरूरी कोशिशें नहीं की गईं।

1. ऑडिट में दवाओं की स्थिति पर क्या पाया गया?

2. अस्पतालों की हालत पर क्या सामने आया?

(i) अस्पतालों पर मरीजों का बोझ
  • कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली के कुछ अस्पतालों में मरीजों का जबरदस्त बोझ दर्ज किया गया। इन अस्पतालों के कुछ विभागों में तो निजी तौर पर प्रत्येक मरीजों के लिए परामर्श का समय भी पांच मिनट से भी कम रहा।
  • इतना ही नहीं बड़े अस्पतालों में तो आम सर्जरी के लिए वेटिंग का समय 2 से 3 महीने लंबा था। वहीं, जलने के बाद होने वाली सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी का वेटिंग टाइम आठ महीने तक का रहा। 
  • बच्चों के लिए तय चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में पीडियाट्रिक सर्जरी के लिए वेटिंग का समय 12 महीने तक का रहा। 

(ii) अस्पतालों में ढाचांगत कमियां
2016-17 में केजरीवाल सरकार की तरफ से पेश हुए बजट में दिल्ली के अस्पतालों में 10 हजार अतिरिक्त बेड्स स्थापित करने की बात कही गई। हालांकि, इसके बाद अगले छह वर्षों में सिर्फ 1357 बेड्स ही अस्पतालों में जोड़े गए। इतना ही नहीं हेल्थकेयर से जुड़ी परियोजनाओं के लिए मुहैया कराए गए 15 प्लॉट एक दशक से भी ज्यादा समय तक इस्तेमाल में नहीं लाए गए।

केजरीवाल सरकार की योजना 2016-17 से 2020-21 तक दिल्ली में कुल 32 हजार बेड्स बढ़ाने की थी। हालांकि, इस आंकड़े के मुकाबले अस्पतालों में सिर्फ 4.2 फीसदी बेड्स ही बढ़ाए जा सके।

(ii) अस्पतालों में ढाचांगत कमियां
2016-17 में केजरीवाल सरकार की तरफ से पेश हुए बजट में दिल्ली के अस्पतालों में 10 हजार अतिरिक्त बेड्स स्थापित करने की बात कही गई। हालांकि, इसके बाद अगले छह वर्षों में सिर्फ 1357 बेड्स ही अस्पतालों में जोड़े गए। इतना ही नहीं हेल्थकेयर से जुड़ी परियोजनाओं के लिए मुहैया कराए गए 15 प्लॉट एक दशक से भी ज्यादा समय तक इस्तेमाल में नहीं लाए गए।

केजरीवाल सरकार की योजना 2016-17 से 2020-21 तक दिल्ली में कुल 32 हजार बेड्स बढ़ाने की थी। हालांकि, इस आंकड़े के मुकाबले अस्पतालों में सिर्फ 4.2 फीसदी बेड्स ही बढ़ाए जा सके।

3. अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े स्टाफ की कमी 



राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के 12 मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर में से छह और जनकपुरी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के सभी 7 मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर में काम कर सकने वाले कर्मियों की कमी की वजह से इस्तेमाल नहीं किए जा सके। 

4. अस्पतालों और टेस्टिंग लैब की गुणवत्ता पर क्या?
 इतना ही नहीं लैब टेस्टिंग को लेकर भी कैग की रिपोर्ट में कई बातें सामने आईं। इसके मुताबिक, कई सरकारी अस्पतालों में के पास गुणवत्ता का मापन करने वाले नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल (एनएबीएच) की तरफ से दी जाने वाली मान्यता ही नहीं थी। यानी मरीजों को गुणवत्तापूर्वक सुविधाएं मिलने की कोई गारंटी नहीं थी।

लोकनायक अस्पताल और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में मौजूद चार में से एक भी टेस्टिंग लैब को नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेट्रीज (एनएबीएल) की तरफ से मान्यता नहीं मिली थी। ऐसे में इन लैब्स में की गई जांचों की गुणवत्ता और इनके सही मानकों पर भी सवाल खड़े होते हैं। 
 

5. आर्थिक कुप्रबंधन और फंड्स का अनुपयोग
दिल्ली को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रजनन, मातृ, नवजात, बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य (RMNCH+A) कार्यक्रम में शामिल किया गया था। इसके लिए एनएचएम ने दिल्ली स्वास्थ्य मिशन को फंड्स भी जारी किए। हालांकि, वित्त वर्ष 2016-17 से लेकर 2021-22 तक एनएचएम ने जितने फंड्स जारी किए, दिल्ली सरकार उसमें से 510.71 करोड़ रुपये के फंड्स का इस्तेमाल ही नहीं कर पाई।

कैग के मुताबिक, अप्रैल 2016 से सितंबर 2022 तक दिल्ली को नेशनल हेल्थ मिशन के तहत जो राशि दी गई थी, उसमें से जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य के लिए चिह्नित राशि में से 57.79 फीसदी खर्च नहीं की गई। इतना ही नहीं, पंजीकृत गर्भवती महिलाओं में से सिर्फ 48.33 फीसदी को ही प्रसवपूर्व देखभाल मिली। वहीं, एचआईवी और अन्य यौन रोगों/गर्भ नली संक्रमण के लिए सिर्फ 36.18 फीसदी और 18.91 फीसदी लोगों की ही टेस्टिंग की गई। 

6. मोहल्ला क्लीनिक परियोजना में कहां देखी गई गड़बड़ी?
  • आप सरकार ने 31 मार्च 2017 तक 1000 मोहल्ला क्लीनिक स्थापित करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन 31 मार्च 2023 तक सिर्फ 523 मोहल्ला क्लीनिक ही शुरू हो पाए। इनमें से 31 सिर्फ शाम के वक्त पर ही संचालित होते थे। 
  • दिल्ली के चार जिलों- उत्तर-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम में आने वाले 218 में से 41 मोहल्ला क्लीनिक 15 दिन से लेकर 23 महीने तक बंद रहे। इसकी वजह स्वास्थ्यकर्मियों की छुट्टी, इस्तीफा, पैनल से हटाया जाना, आदि रहा।
  • 74 मोहल्ला क्लीनिकों में सुविधाओं से जुड़े ऑडिट किए गए। इनमें से 10 में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी। 21 में टॉयलेट नहीं थे। 12 में दिव्यांगों के लिए ढंग की व्यवस्था नहीं थी। 15 में पावर बैकअप की व्यवस्था नहीं थी। वहीं, 31 में दवा रखने के इंतजाम नहीं देखे गए। 

  • मोहल्ला क्लीनिकों में आधारभूत चिकित्सा उपकरण नहीं मिले। इनमें ऑक्सीमीटर, ग्लूकोमीटर, एक्सरे देखने वाला बोर्ड, थर्मामीटर और रक्तचाप मापने से जुड़ी मशीनें, आदि शामिल रहीं। 
  • इसके अलावा दवाओं के लिए 81 मोहल्ला क्लीनिकों की जांच हुई, इनमें से 39 में 75 फीसदी तक आवश्यक दवाओं की कमी दर्ज हुई। 
  • अक्तूबर 2022 से मार्च 2023 के बीच मोहल्ला क्लीनिक जाने वाले 70 फीसदी मरीजों को एक मिनट से भी कम तक परामर्श मिला।

7. कोरोनावायरस महामारी के दौरान कहां हुईं कमियां?

(i) टीकाकरण के खर्च में

कैग रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने कोरोनाकाल में टीकाकरण के लिए दिल्ली सरकार को दो इंस्टॉलमेंट में 9.60 करोड़ रुपये मुहैया कराए। पहली इंस्टॉलमेंट 3.46 करोड़ रुपये की थी, जिसे जनवरी 2021 में जारी किया गया। वहीं, अगली किस्त 6.14 करोड़ रुपये की थी, जिसे मार्च 2021 में भेजा गया। यह रकम लगभग तुरंत ही दिल्ली सरकार के पास पहुंच गई। हालांकि, उसकी तरफ से फंड्स को अप्रैल 2021 और मई 2021 में रिलीज किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि यह वही समय था, जब कोरोनावायरस की दूसरी लहर ने देशभर में तबाही मचा दी थी। कैग के मुताबिक, महामारी के समय में टीकाकरण के लिए जो फंड दिया गया, उस 9.60 करोड़ में से 7.92 करोड़ ही इस्तेमाल हुआ। 

(ii) कोरोना के लिए आपात स्थिति में दिए फंड का भी नहीं हुआ इस्तेमाल
दिल्ली सरकार को केंद्र की तरफ से कोरोनावायरस महामारी से निपटने के लिए आपात तौर पर 787.91 करोड़ रुपये जारी किए थे। इनमें से 24.67 करोड़ रुपये एकमुश्त दिए गए। जबकि पहले फेज में 292.22 करोड़ और दूसरे फेज में 471 करोड़ रुपये मुहैया कराए गए। आप सरकार ने इनमें से सिर्फ 542.84 करोड़ रुपये का फंड ही इस्तेमाल किया। 
 
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