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Coaching Tragedy: हर संकट पर भारी पड़ रही अफसर बनने की चाह, फिर आईएएस बनने की तैयारी में जुटे छात्र

सार

Delhi Coaching Tragedy: हादसे के समय बच्चों की सुरक्षा को लेकर तमाम तरह की चिंताएं व्यक्त की गई थीं। सरकार से लेकर विपक्ष तक इसके लिए तमाम लोगों को जिम्मेदार बता रहा था। लोग यह भी बता रहे थे कि इस तरह के हादसे को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए।
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Delhi Coaching Accident - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इसी साल 27 जुलाई को आईएएस परीक्षा की तैयारी में जुटे तीन छात्रों की वर्षा के पानी में डूबने से मौत हो गई थी। ओल्ड राजिंदर नगर इलाके की एक प्रख्यात कोचिंग सेंटर में हुए इस हादसे ने दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। अपने बच्चों को अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर भेजकर एक उम्मीद पालने वालों को इस हादसे से बड़ा झटका लगा था। इस घटना को बीते तीन महीने का भी समय नहीं बीता है, लेकिन ओल्ड राजेंद्र नगर में अब सब कुछ सामान्य हो चुका है। बच्चे एक बार फिर अपने सपनों को पूरा करने में जुट गए हैं। 

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हादसे के समय बच्चों की सुरक्षा को लेकर तमाम तरह की चिंताएं व्यक्त की गई थीं। सरकार से लेकर विपक्ष तक इसके लिए तमाम लोगों को जिम्मेदार बता रहा था। लोग यह भी बता रहे थे कि इस तरह के हादसे को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए। राजेंद्र नगर हादसे के लिए सर्वोच्च न्यायालय में वाद भी चल रहा है जिसमें लगभग छः लोगों को हादसे के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार बताया जा रहा है। 

लेकिन इधर राजेंद्र नगर में अब बच्चों की सुरक्षा पर कोई बात नहीं कर रहा है। कोचिंग के बड़े संस्थानों में बच्चों की सुरक्षा पहले भी थी, अब भी यहां सीसीटीवी, सुरक्षा गार्ड, निकास द्वार की पर्याप्त चौड़ाई, अग्निशमन यंत्र दिखाई दे रहे हैं। लेकिन यहां की छोटी-छोटी गलियों में चल रही लाइब्रेरियों में अब भी कोई इंतजाम नहीं है। 
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निहारिका गोस्वामी (26 वर्ष) बिहार के गोपालगंज से आई हैं। उनका सपना है कि वे यहां से एक आईएएस ऑफिसर बनकर जाएं। उन्होंने अमर उजाला को बताया कि अच्छी कोचिंग संस्थाओं में हर तरह की सुरक्षा को ध्यान में रखा जा रहा है। कक्षाओं से लेकर लिफ्ट तक में अलार्म बेल से लेकर सीसीटीवी कैमरे तक उपलब्ध हैं। हॉस्टल में भी देखरेख रखी जा रही है। लेकिन छोटे कोचिंग सेंटरों, लाइब्रेरियों और तंग गलियों में बने हॉस्टलों में अभी भी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। लेकिन सभी बच्चे अपने करियर को लेकर ज्यादा जागरूक हैं। अपने स्तर पर सुरक्षा की परवाह करते हुए वे आगे बढ़ रहे हैं।             

स्वप्निल जैन (28 वर्ष) लखनऊ से आए हैं। उन्हें लगता है कि हादसे के बाद बच्चों के साथ-साथ कोचिंग संचालकों में भी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। सरकार ने इन इलाकों से कोचिंग संस्थाओं को खुले और सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए कह दिया है। इससे सबके अंदर चिंता बढ़ गई है। लेकिन अफसर बनने की चाह सभी चिंताओं पर भारी पड़ रही है। वे अपने सभी दोस्तों के साथ मिलकर परीक्षा की तैयारियों में जुट गए हैं। 

आईएएस-आईपीएस बनने के लिए कड़ी मेहनत में जुटे छत्तीगढ़ के एक छोटे से कस्बे से आये रविन्द्र ने कहा कि यहां मैं एक साल से रह रहा हूं। वे एक कोचिंग सस्थान में पढ़ते हैं। इस क्षेत्र में बहुत सी लाइब्रेरी बेसमेंट में चल रही हैं जहां आज भी बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता है। लेकिन हादसे के बाद भी यहां पर बहुत से बच्चे पढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन सबको लाइब्ररियों के बंद होने का डर था, मगर इनके खुलने से सभी खुश हैं। 

मध्य प्रदेश के भोपाल के रहने वाले दिनेश के पिता किसान हैं, लेकिन उनका सपना है कि उनका बेटा एक अफसर बने। उन्होंने अमर  उजाला से कहा कि उनके लिए ये कोचिंग संस्थान ही उनका घर बन गया है। सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता भी बढ़ गई थी, लेकिन अब यहां बहुत सकारात्मक माहौल है। यहां  दोस्त हैं, टीचर हैं और ढेर सारी किताबें हैं। उन्होंने कहा कि हमें भी लगता है कि यदि हम अपनी ओर से थोड़े से सावधान रहें तो इस तरह की दुर्घटना से बच सकते हैं।

क्या कहते हैं कोचिंग संचालक
कोचिंग संस्थानों को भी लग रहा है कि यदि उनकी तरफ से कोई लापरवाही हुई तो उन पर गाज गिर सकती है। संभवतः यही कारण है कि अब कोचिंग संचालक भी बहुत सतर्क हो गए हैं। वाजीराम एंड रवि के निदेशक अर्जुन रविन्द्रन ने अमर उजाला से कहा कि उस हादसे ने हम लोगों को चिंतित कर दिया था। लेकिन अब सभी सतर्क होकर अपना काम कर रहे हैं। बच्चे भी पढ़ाई में जुट गए हैं। उन्होंने कहा कि घटना से प्रभावित छात्रों के परिवार को उन्होंने आर्थिक सहायता दी और दुर्घटनाग्रस्त कोचिंग संस्थान के छात्रों को मुफ्त कोचिंग दे रहे हैं। 

अर्जुन रविन्द्रन ने कहा कि हम सब बुनियादी ढांचे और सरकारी नियमों के पालन को पूरी प्राथमिकता दे रहे हैं। बच्चों को किसी तरह की असुविधा न हो, इसका प्रयास किया जा रहा है। लेकिन बच्चों की सुरक्षा उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता में रहती है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सभी अधिकारियों से मिलकर उचित कदम उठाए जा रहे हैं जिससे किसी तरह का हादसा न हो। 

नेता ने कहा, 'कोचिंग सेंटर यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़, कोचिंग संस्थानों को खत्म करना सही नहीं'   
दिल्ली भाजपा के पूर्व महामंत्री राजेश भाटिया ने सबसे पहले राजेंद्र नगर हादसे की सूचना लोगों तक पहुंचाई थी। उन्होंने इस घटना के पहले ही राजेंद्र नगर की नालियों और ड्रेनेज सिस्टम को साफ कराने में हो रही लापरवाही की तरफ सबका ध्यान आकर्षित कराया था। उनका मानना है कि यदि उनकी चेतावनी पर एजेंसियों ने ध्यान दिया होता तो इस तरह के हादसों को रोका जा सकता था। 

राजेश भाटिया ने अमर उजाला से कहा कि राजेंद्र नगर में हुए हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों को दंड दिया जाना चाहिए। लेकिन भविष्य में इस तरह की घटना न घटे, इसके लिए सभी जिम्मेदार लोगों को सतर्क रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि नालों की साफ-सफाई का काम समय से किया गया होता तो हादसे को रोका जा सकता था। उन्होंने कहा कि इसके लिए छात्रों, अभिभावकों, अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों को मिलाकर एक कमेटी बननी चाहिए जो इलाके की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें। इसी तरह से ऐसे हादसों को रोका जा सकता है। 

छोटे संस्थानों को बंद करने से छात्रों का नुकसान
भाजपा नेता ने कहा कि छात्र राजेंद्र नगर, जिया सराय या मुखर्जी नगर जैसे इलाकों की अर्थव्यवस्था का केंद्र हैं। छात्रों से ही कोचिंग संस्थान चलते हैं। उन्हीं से मिलने वाले किराये पर बहुत से लोगों की आय टिकी हुई है। भोजन के ढाबों, होटलों, लाइब्रेरियों और कोचिंग संस्थानों के माध्यम से यहां लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। यदि नियमों का आड़ लेते हुए छोटे-छोटे संस्थाओं को बंद किया जाएगा तो इससे कमजोर या गरीब छात्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर पाना कठिन हो जाएगा। साथ ही स्थानीय लोगों के रोजगार पर भी बुरा असर पड़ेगा। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोचिंग संस्थानों को चलाना ही सबके लिए हितकर है।    
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