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निर्णायक लड़ाई: सूखे पत्तों-पेड़ की जड़ों से चोट पहुंचा रहे नक्सली; चप्पे-चप्पे पर IED, खोजी कुत्ते भी गुमराह

सार

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के ऑपरेशन अब निर्णायक दौर में पहुंच चुके हैं। माओवादियों के खात्मे की समयसीमा 31 मार्च करीब आने के साथ ही कहीं मुठभेड़ तो कहीं आत्मसमर्पण जारी है। इस बीच सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन भी शुरू कर दिए हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
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विस्तार
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देश के कुछ इलाकों में बचे चंद नक्सली अब सीधी मुठभेड़ की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने अब सूखे पत्तों और पेड़ की जड़ों से सुरक्षा बलों को चोट पहुंचाने की रणनीति बनाई है। इसी रणनीति का िशकार सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट अजय मलिक रविवार को सारंडा झारखंड के जंगल में सर्च ऑपरेशन के दौरान हो गए। अभियान के दौरान उनका पैर पत्ताें के नीचे दबे आईईडी पर पड़ गया और बुरी तरह जख्मी हो गए। गंभीर हालत में उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया है।
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अधिकतर इलाके, जहां पर अब नक्सलियों का कब्जा नहीं रहा, वहां सैंकड़ों प्रेशर आईईडी दबाई गई हैं। नक्सलियों को पता था कि यहां सर्च ऑपरेशन के लिए जवान पहुंचेंगे। हालांकि, सुरक्षा बल आईईडी से बचाव के लिए तकनीकी उपकरण और स्निफर डॉग की मदद लेते हैं, लेकिन घने जंगल में चारों तरफ पड़े सूखे पत्तों के कारण हर जगह को सेनेटाइज करना आसान नहीं है।
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नक्सलियों की ओर से ज्यादातर प्रेशर आईईडी लगाई जाती है। इस पर जवान या अधिकारी का पैर पड़ते ही वह फट जाती है। दूर बैठा व्यक्ति इसे संचालित कर सकता है। सीआरपीएफ की ओर से गत वर्षों में हजारों आईईडी बम बरामद किए गए हैं। आईईडी विस्फोट करने में टाइमिंग बहुत अहम प्वाइंट है। एक्सपर्ट व्यक्ति ही इसे सुरक्षित तरीके से ब्लास्ट कर सकता है।
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स्निफर डॉग को कर देते हैं गुमराह
नक्सली सुरक्षा बलों से बचने के लिए स्निफर डॉग को भी गुमराह कर देते हैं। इसके लिए वे रास्ते पर कोई सुगंधित पदार्थ डाल देते हैं। इससे कुत्तों की सुंघने की क्षमता प्रभावित हो जाती है और कई बार कुत्ता गलत दिशा को फॉलो करता है तो उस स्थिति में पीछे चलने वाले जवान भटक जाते हैं और आईईडी विस्फोट की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है।

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