एक व्यापारी ने अमर उजाला को बताया कि रोज-रोज की जरूरतों के लिए उन्हें अक्सर स्थानीय महाजनों से कर्ज लेना पड़ता है। यह जरूरत के अनुसार 10 रुपये से 20 रुपये प्रति सैकड़ा तक होता है। इसका अर्थ है कि अगर छोटा व्यापारी सुबह 100 रुपये का कर्ज लेता है तो उसे शाम को महाजन को 100 रुपये के मूल के साथ 10 या 20 रुपये जैसा तय हुआ हो, 110 या 120 रुपये चुकाने पड़ते हैं। यह 3600 या 7200 प्रतिशत वार्षिक होता है।
मजबूरी में लेते हैं कर्ज
बिना किसी औपचारिकता के सीधे जान-पहचान के कारण ये महाजन इन्हें बिना किसी औपचारिता के लोन दे देते हैं। छोटे व्यापारी शाम तक इन्हें चुका देते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें भारी ब्याज देना पड़ता है। चूंकि, बैंकों से सीधे इतनी आसानी से जल्दी इन्हें लोन नहीं मिल सकता, महाजनों का धंधा लगातार चलता रहता है। प्रधानमंत्री की स्वनिधि योजना ऐसे व्यापारियों के लिए बेहद लाभप्रद साबित हुई है।
नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्ट्रीट फूड वेंडर्स ऑफ इंडिया (एनएसवीआई) की पदाधिकारी संगीता सिंह ने अमर उजाला से कहा कि स्वनिधि योजना का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि छोटे-छोटे दुकानदार अपने छोटे कर्ज के लिए स्थानीय महाजनों के चंगुल से बच रहे हैं। जो उनसे रोजाना के तौर पर 10-20 प्रतिशत तक का ब्याज लेते हैं।
इस योजना का एक और लाभ हुआ है कि लोन लेने के कारण इन स्ट्रीट वेंडर्स की एक आधिकारिक पहचान बन रही है। अगर सरकार भविष्य में इस वर्ग के लिए कोई अच्छी योजना लेकर आती है तो इसका इन्हें सीधा लाभ मिल सकेगा।
अब तक बैंक इस वर्ग के लोगों को कोई लोन नहीं देते थे। इनका बैंक तक जाना और काम कराना मुश्किल का काम हुआ करता था। लेकिन स्वनिधि योजना के कारण अब बैंक अधिकारियों को भी मालूम है कि वे इन्हें लोन देने से इनकार नहीं कर सकते। इससे वेंडर्स-छोटे कारोबारियों का बैंक से लेनदेन बढ़ा है जो उनके लिए हर दृष्टि से बेहद कारगर साबित होगा।
केंद्र की पहल के बाद भी लाखों छोटे कारोबारी हैं जिन्हें अभी भी बैंक लोन देने में अनाकानी कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने स्वयं माना है कि इस लोन के लिए 41.74 लाख लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन इनमें से केवल 20.56 लाख छोटे कारोबारियों को ही लोन मिल पाया। सरकार को इन कारणों का अध्ययन करना चाहिए कि बाकी लोगों को लोन क्यों नहीं मिल पाया।
शिकायतें आई हैं कि योजना का लाभ लेने के लिए अनेक दूसरे कामकाज करने वाले लोग भी इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। इससे बाद में असली रेहड़ी-पटरी वालों की पहचान का संकट पैदा हो सकता है। सरकार की योजना के खामी के कारण दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट के सैकड़ों कारोबारियों ने लोन लेने से मना कर दिया।
कोरोना के कारण रेहड़ी-पटरी पर भोजन बनाकर बेचने वाले लोगों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। उनके सामने भोजन तक का संकट पैदा हो गया है। सरकार को चाहिए कि वह उचित नियमों का पालन करवाते हुए इस वर्ग को भी कामकाज करने की अनुमति दे।