सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई भी कानून मौलिक अधिकारों को हनन करता है तो हम कानून को संशोधित या निरस्त करने के लिए बहुमत वाली सरकार केनिर्णय का इंतजार नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने कहा है कि दो समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए यौनसंबंध(धारा-377) की वैधता तय करते वक्त संवैधानिक मूल्यों का पालन किया जाएगा न कि यह देखा जाएगा कि इस मसले में अधिकतर लोगों की सोच क्या है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान ने धारा-377 की वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए यह साफ किया कि इस कानून को पूरी तरह से निरस्त नहीं किया जाएगा बल्कि यह दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध तक ही सीमित रहेगा। पीठ ने कहा कि अगर धारा-377 को पूरी तरह निरस्त कर दिया जाएगा तो आरजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। हम सिर्फ दो समलैंगिक वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए यौन संबंध पर विचार कर रहे है। यहां सहमति ही अहम बिन्दु है। पीठ ने कहा कि आप बिना दूसरे की सहमति से अपने यौन झुकाव को नहीं थोप सकते।
पीठ ने यह भी कहा कि अगर कोई भी कानून मौलिक अधिकारों को हनन करता है तो हम कानून को संशोधित या निरस्त करने के लिए बहुमत वाली सरकार केनिर्णय का इंतजार नहीं कर सकते। पीठ ने कहा, 'मौलिक अधिकारों का पूरा उद्देश्य है कि यह अदालत को निरस्त करने का अधिकार देता है। हम बहुमत वाली सरकार द्वारा कानून को निरस्त करने का इंतजार नहीं कर सकते। अगर कानून असंवैधानिक है तो उस कानून को निरस्त करना अदालत का कर्तव्य है।’
वास्तव में पीठ ने ये टिप्पणी तब की जब चर्च के एक एसोसिएशन की ओर से पेश वकील श्याम जॉर्ज ने कहा कि यह अदालत का काम नहीं है बल्कि कानून बनाना या संशोधन करना विधायिका का काम है। उनका कहना था कि 'अप्राकृतिक यौन संबंध’ प्रकृति के विपरीत है और दंडात्मक प्रावधान में सहमति की बात नहीं है।
पीठ ने कहा, 'प्राकृतिक और स्वाभाविक क्या है? क्या बच्चा पैदा करने के लिए ही यौन संबंध बनाना प्राकृतिक है। क्या वैसे यौन संबंध जिनसे बच्चा पैदा नहीं होता, वह प्राकृतिक नहीं है।’
वहीं एक एनजीओर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के राधाकृष्णन ने पीठ केसमक्ष दावा किया कि समलैंगिकता एड्स को बढ़ावा देता है। जवाब में पीठ ने कहा कि लोगों के बीच राय है कि समलैंगिक संबंध रखने वाले लोग स्वास्थ्य केप्रति गंभीर होते हैं। पीठ ने कहा, 'अगर आप वैश्यावृति को लाइसेंस देते हैं तो आप इस पर नियंत्रण रखते हैं। अगर आप इसे छुपा कर करना चाहते हैं तो इससे स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होती है।’ पीठ ने यह भी कहा कि असुरक्षित संबंध से एड्स का खतरा होता है न कि समलैंगिकता से।