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पुण्यतिथि विशेष: पूर्ण स्वराज्य की सर्वप्रथम मांग उठाई और लोगों के लिए बन गए 'लोकमान्य'

Wed, 01 Aug 2018 04:02 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
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गुलाम भारत की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले महान समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक की आज पुण्यतिथि है। माना जाता है कि महात्मा गांधी के आंदोलन को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान तिलक का ही था। असहयोग आंदोलन के लिए जब एक साल के भीतर एक करोड़ रुपये जमा करने का लक्षय रखा गया तो गांधी जी ने तिलक की पुण्यतिथि पर कोष को नाम दिया तिलक स्वराज फंड। देश की जनता तिलक का बहुत स्म्मान करती थी और उन्होंने जितना हो सका उतना फंड दिया। तिलक के जनता पर प्रभाव के कारण ही यह असंभव सा दिखने वाला लक्षय संभव हो गया।

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'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' उनका यही कथन लोगों के दिलों में संघर्ष जगा गया और उन्हें 'लोकमान्य' के नाम से प्रसिद्ध कर गया।

तिलक का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरि) के चिक्कन गांव में 23 जुलाई 1856 को हुआ था। उनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। अपने परिश्रम के बल पर पाठशाला के मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे, अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ट था।
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सन 1879 में तिलक ने बी.ए. तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। घरवाले और उनके मित्र संबंधी यह आशा कर रहे थे कि तिलक वकालत कर धन कमाएंगे और वंश के गौरव को बढ़ाएंगे, परंतु तिलक ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत धारण कर लिया था।

कॉलेज की स्थापना की

हिन्दुस्तान के एक प्रमुख नेता तिलक ने परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन 1880 में उन्होंने न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता रहे तिलक ने ही सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थी।

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लोगों के बीच संघर्ष का साहस भरा

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंग्रेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया।

6 साल के लिए देश निकाला का दंड

तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंग्रेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर छ: साल के लिए 'देश निकाला' का दंड दिया और बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया।

इस अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और गीता रहस्य नामक भाष्य भी लिखा। तिलक के जेल से छूटने के बाद जब उनका गीता रहस्य प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार-प्रसार आंधी-तूफान की तरह बढ़ा और जनमानस उससे अत्यधिक आंदोलित हुआ।

दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए

तिलक ने मराठी में 'मराठा दर्पण व केसरी' नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए जो जनता में काफी लोकप्रिय हुए। जिसमें तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की।

उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को तुरंत पूर्ण स्वराज देने की मांग की, जिसके फलस्वरूप और केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। तिलक अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए भी जाने जाते थे। भारत के इस वीर स्वतंत्रता सेनानी का निधन 1 अगस्त साल 1920 को मुंबई में हुआ।
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