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स्वास्थ्य सेवाओं में तेजी लाने के लिए सरकार का डाटा बैंक तैयार

Fri, 03 Jan 2020 04:00 AM IST
संजीव कुमार झा परीक्षित निर्भय, अमर उजाला

सार

  • आयुष्मान भारत के बाद और नई योजनाओं पर काम शुरू
  • देश के पांच लाख से ज्यादा घरों से तैयार हुआ है डाटा, सभी जिले शामिल
  • एक वर्ष के भीतर प्रति मरीज सरकारी और निजी अस्पताल में इलाज खर्च तक निकाला
  • निजी अस्पतालों में महंगा इलाज, बीमारी के अनुसार खर्च और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य तक को किया है शामिल
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डॉक्टर हर्षवर्धन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रधानमंत्री जनआरोग्य योजना (आयुष्मान भारत) के बाद सरकार अब स्वास्थ्य सेवाओं में नए बदलाव की ओर बढ़ रही है। इसके लिए भारत सरकार के सांख्यिकी विभाग ने डाटा बैंक भी तैयार कर लिया है जिसमें देश के पांच लाख से ज्यादा परिवारों को शामिल करते हुए एक साल का पूरा रिकॉर्ड बनाया है।

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इसके तहत सरकार के पास सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के उपचार खर्च में मौजूदा अंतर से जुड़ी जानकारी एकत्रित हो चुकी है। प्राइवेट अस्पतालों में प्रति बेड मरीज का होने वाला खर्च, विभिन्न रोगों की ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्थिति इत्यादि शामिल हैं।

इनके अलावा देश में एलोपैथी और आयुष उपचार सेवाओं का लाभ कितने प्रतिशत जनता को मिल रहा है? इस पर भी सरकार काम कर रही है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार लगातार स्वास्थ्य सेवाओं को सरल बनाने में जुटी है। इसके लिए नीति आयोग नई योजनाओं पर काम कर रहा है। हाल ही में आयोग ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के साथ जिला अस्पतालों को पीपीपी मोड के जरिए जोडने का ड्राफ्ट तक जारी किया है।
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आगामी 10 जनवरी तक इस ड्राफ्ट पर सलाह व आपत्ति भी मांगी है। साथ ही 21 जनवरी को इसे लेकर आयोग एक अहम बैठक भी करने जा रहा है।

जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच देश के सभी जिलों में सर्वे के बाद तैयार डाटा बैंक मंत्रालय को सौंप दिया है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इस डाटा बैंक का इस्तेमाल आगामी दिनों में स्वास्थ्य की नई योजनाओं में किया जाएगा। हालांकि इन योजनाओं के प्रारूप को फिलहाल गोपनीय रखा है।

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अस्पताल में दाखिला, इलाज पर खर्च

जानकारी के अनुसार देश के सरकारी अस्पतालों में 30, प्राइवेट में 23.1, प्राइवेट डॉक्टर या क्लीनिक में 42.5 और ट्रस्ट के अस्पताल में 1.1 फीसदी मरीजों को उपचार मिल रहा है। देश में सर्वाधिक 31.4 फीसदी मरीजों को संक्रमण के चलते भर्ती होना पड़ रहा है। जबकि 11.2 फीसदी घायल होने के बाद और 9.9 फीसदी मरीज पेट से जुड़ी परेशानियों के चलते अस्पताल में भर्ती हो रहे हैं।

सरकारी अस्पताल में भर्ती एक मरीज के उपचार पर 4,452 रुपये का खर्चा आ रहा है। जबकि प्राइवेट अस्पताल में करीब 31,845 रुपये है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अगर कोई मरीज कैंसर से पीड़ित है तो सरकारी अस्पताल में चिकित्सीय व्यय 22,520 रुपये है जबकि प्राइवेट अस्पताल में ये 93,305 रुपये तक है। प्राइवेट अस्पताल के इस खर्च में डॉक्टर की फीस से लेकर बेड इत्यादि के चॉर्ज तक शामिल हैं।
 

एलोपैथी-आयुष ओपीडी का अतंर

रिपोर्ट में ओपीडी सेवाओं का भी जिक्र किया गया है। शहरी क्षेत्र के सरकारी अस्पताल में मरीज पर एलोपैथी की ओपीडी पर प्रति मरीज 343 रुपये और आयुर्वेद के लिए 483 रुपये का खर्च आता है। प्राइवेट अस्पताल की बात करें तो एलोपैथी के लिए 1,036 और आयुर्वेद ओपीडी में प्रति मरीज 1,010 रुपये का खर्चा आता है। जबकि इन्हीं अस्पतालों की होम्यिपैथी ओपीडी में 1603 और योग व नेचुरोपैथी के लिए मरीज को 461 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
 

प्राइवेट अस्पतालों में सिजेरियन केस

सर्व रिपोर्ट में विभाग ने देश भर के अस्पतालों और नर्सिंग होम में प्रसूति को लेकर भी डाटा तैयार किया है जिसके अनुसार सरकारी अस्पतालों में 34.9 फीसदी सिजेरियन केस हैं, जबकि प्राइवेट अस्पतालों में 62.7 फीसदी महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी कराई जा रही है। इनके अलावा रिपोर्ट में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के नवजात शिशुओं के टीकाकरण और उसे लेकर आने वाले खर्च का ब्यौरा भी है।
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