भारत सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों से कहा है कि वो दलित शब्दावली का इस्तेमाल ना करें। मंत्रालय का कहना है कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्दावली है और इसी का इस्तेमाल किया जाए। मंत्रालय के इस फैसले का देश भर के कई दलित संगठन और बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि दलित शब्दावली का राजनीतिक महत्व है और यह पहचान का बोध कराता है।
इसी साल मार्च महीने में सामाजिक न्याय मंत्रालय ने भी ऐसा ही आदेश जारी किया था। मंत्रालय ने सभी राज्यों के सरकारों को निर्देश दिया था कि आधिकारिक संवाद या पत्राचार में दलित शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया जाए।
मंत्रालय का कहना है कि दलित शब्दावली का जिक्र संविधान में नहीं है।
सरकार में ही मतभेद
सरकार के इस निर्देश पर केंद्र की एनडीए सरकार में ही मतभेद है। एनडीए की सहयोगी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के नेता और मोदी कैबिनेट में सामाजिक न्याय राज्य मंत्री रामदास अठावले दलित के बदले अनुसूचित जाति शब्दावली के इस्तेमाल के निर्देश से खुश नहीं हैं।
अठावले महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स आंदोलन से जुड़े रहे हैं और कहा जाता है कि इसी आंदोलन के कारण दलित शब्दावली ज्यादा लोकप्रिय हुई। अठावले का कहना है कि दलित शब्दावली गर्व से जुड़ी रही है।
वहीं सूचना प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि यह आदेश बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देश पर दिया गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी मोहनलाल मनोहर नाम के एक व्यक्ति ने दलित शब्दावली के इस्तेमाल को बंद करने के लिए याचिका दायर की थी।
याचिका में कहा गया था कि दलित शब्द अपमानजनक है और इसे अनुसूचित जातियों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इसे लेकर कोर्ट का कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने सरकार को इस पर विचार करने के लिए कहा था।
दलित शब्द का सामाजिक संदर्भ
यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है, ''मराठी में दलित का मतलब शोषित और अछूत से है। यह एक व्यापक शब्दावली है जिसमें वर्ग और जाति दोनों समाहित हैं। दलित शब्द का इस्तेमाल कहीं से भी अपमानजनक नहीं है। यह शब्दावली चलन में 1960 और 70 के दशक में आई। इसे साहित्य और दलित पैंथर्स आंदोलन ने आगे बढ़ाया।''