देश में डिजिटल फ्रॉड लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पहले ये फ्रॉड देश के विभिन्न हिस्सों से अंजाम दिए जाते थे, लेकिन जब जांच एजेंसियों का शिकंजा कसा तो साइबर अपराधी दूसरे मुल्कों में जाकर वित्तीय फ्रॉड करने लगे हैं। पिछले साल सीबीआई और आरबीआई के संयुक्त प्रयासों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन‑लर्निंग टूल की मदद से 'म्यूल हंटर' ऐप तैयार किया गया था। इसके सार्थक नतीजे सामने आ रहे हैं। 'म्यूल हंटर' की मदद से जो संदिग्ध खाते ब्लॉक किए जा रहे हैं, उनमें सत्तर फीसदी ठीक हैं। यानी, इतने खातों को अनब्लॉक कराने के लिए कोई नहीं पहुंचा। मतलब, म्यूल खाते 'फाइनेंसियल साइबर क्राइम' की अहम कड़ी बनते जा रहे हैं। अब म्यूल खाते के जरिए पैसे कमाने वाले लोग भी सावधान हो जाएं। सीबीआई उन्हें छोड़ेगी नहीं। केंद्रीय जांच एजेंसी के टारगेट पर अब पहला और तीसरा आपरेटर होगा। यानी समय रहते साइबर फ्रॉड की शिकायत मिल जाती है तो पीड़ित व्यक्ति का पैसा बचाया जा सकता है।
'म्यूल हंटर' एप के जरिए कार्रवाई
सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद बताते हैं, जांच एजेंसी का मकसद पीड़ित व्यक्ति को राहत देना और अपराधी को सजा दिलाना है। 'म्यूल हंटर' एप के जरिए आर्थिक फ्रॉड करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। ये तो सब जानते हैं कि अब कंबोडिया, मलेशिया और म्यांमार सहित कई दूसरे देशों से साइबर अपराध को अंजाम दिया जा रहा है। जांच एजेंसी का प्रयास अब 'फ्रॉड चेन' की पहली और तीसरी कड़ी को तोड़ना रहेगा। यानी फ्रॉड के बाद वह पैसा किस खाते में जमा हुआ है। वहां से कहां पर ट्रांसफर हो रहा है। कौन से वित्तीय संस्थान इस चेन में शामिल हैं। इस चेन में दूसरे नंबर पर साइबर अपराधी है, जिसने फ्रॉड को अंजाम दिया है। अगर प्रारंभ में ही उस अपराधी के पीछे पड़ेंगे तो पैसा नहीं बचाया जा सकेगा। अपराधी तो दूसरे मुल्क में है। वहां तक पहुंचने की एक तय प्रक्रिया है। उसमें काफीसमय भी लग सकता है।
बतौर सीबीआई निदेशक, ऐसे में जांच एजेंसी की प्राथमिकता यह रहेगी कि फ्रॉड का पता अगर 'गोल्डन आवर' यानी घटना के बाद पहले घंटे में ही लग जाता है तो पैसे बचाए जाने की प्रक्रिया शुरु की जा सकती है। जिस किसी व्यक्ति के साथ फ्रॉड होता है, वह तुरंत बिना कोई देरी किए उसे संबंधित एजेंसी के पास रिपोर्ट कराए। मतलब, फौरन शिकायत दर्ज कराए। अगर समय पर शिकायत मिल जाती है तो जांच एजेंसी, खाते से गायब हुए पैसे को बचा सकती है। आजकल, फ्रॉड करने वाले व्यक्ति, एआई का इस्तेमाल करते हैं। जैसे वे किसी व्यक्ति को अपने झांसे में फंसाकर जब उसके खाते पर हाथ डालते हैं तो सबसे पहले पैसे को ट्रांसफर किया जाता है। ये काम मैनुअली नहीं होता। इसमें एआई की मदद ली जाती है। एआई, उस पैसे को निर्धारित खातों में ट्रांसफर कर देता है। सीबीआई, उन खातों को ब्लॉक करा सकती है। पहले घंटे में शिकायत दिए जाने के बाद कम से कम 40 फीसदी मामलों में पैसा वापस मिलने की संभावना बनी रहती है।
इसमें 'म्यूल हंटर' की बड़ी भूमिका रहती है। म्यूल हंटर ऐप में जब भी कोई संदिग्ध खाता आता है तो उस पर रेड फ्लैग लग जाता है। करीब सत्तर फीसदी ब्लॉक खातों को खुलवाने के लिए कोई नहीं आता। इसका मतलब, वे फ्रॉड की चेन में शामिल हैं। केवल तीस प्रतिशत लोग ही अपने खाते को अनब्लॉक कराने के लिए सामने आते हैं। म्यूल खाता धारकों में अब वे लोग भी शामिल हो रहे हैं, जिन्हें साइबर अपराधियों द्वारा छोटा मोटा लालच दे दिया जाता है। जैसे आपके खाते हम पैसे जमा करा रहे हैं। इसके लिए आपको इतने पैसे मिलेंगे। उसके बाद किसी दूसरे खाते में पैसे ट्रांसफर हो जाते हैं। आम आदमी, इस चाल को समझ नहीं पाते। वे यही सोचते हैं कि कंपनी की तरफ से यह एक स्कीम है। इसी के चलते वे आगे बढ़ जाते हैं। सीबीआई और आरबीआई के अफसरों की बैठक के बाद यह तय किया गया है कि प्रारंभ में चार बैंकों को यह ऐप मुहैया कराया जाए। यह प्रक्रिया शुरु हो चुकी है। इसके अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। बाद में करीब डेढ़ दर्जन बैंकों को इससे जोड़ा जाएगा। इसमें सरकारी, प्राइवेट और सहकारी बैंक शामिल रहेंगे। हालांकि इस बाबत एक 'एसओपी' भी तैयार की जा रही है।
म्यूल खाता, उसे कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल धोखाधड़ी करने वाले लोग करते हैं। लालच देकर किसी व्यक्ति के नाम पर खाता खुलवा दिया जाता है। वहां से उन पैसों को ट्रांसफर किया जाता है। इस दौरान उस व्यक्ति को साइबर अपराधियों का पता नहीं चलता है। उनकी पहचान छिपी रहती है। गत वर्ष बैंकों से प्राप्त 21.65 लाख से अधिक संदिग्ध पहचानकर्ताओं का डेटा और 26.48 लाख लेयर 1 म्यूल खातों का डेटा संदिग्ध रजिस्टर में शामिल संस्थाओं के साथ साझा किया गया है। इसके चलते 9055.27 करोड़ रुपये के लेन-देन अस्वीकृत किए गए हैं। साइबर अपराध की 361,000 शिकायतों के माध्यम से 8,189 करोड़ रुपये की राशि को सफलतापूर्वक बचाने में कामयाबी हासिल की गई है।
हेल्पलाइन 1930 साइबर फ्रॉड से पीड़ितों को बचाने का एक कारगर साधन
एक अनुमान के मुताबिक, कुल फ्रॉड की राशि 20,000 करोड़ रुपये के आसपास थी, जिसमें से 8,189 करोड़ रुपये को फ्रीज करवाया या पीड़ितों को वापस करवाया गया है। मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में 'साइबर-सक्षम धोखाधड़ी से निपटने और इसके ईकोसिस्टम को ध्वस्त करने' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा, साइबर अपराध की रोकथाम में सीबीआई और एनआईए की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के बाहर से होने वाले साइबर अपराधों को रोकने के लिए भी सभी संस्थाओं के साथ मजबूत संवाद और समन्वय स्थापित करना होगा।
डिजिटल साक्ष्यों की 'चेन ऑफ कस्टडी' में त्रुटि होने पर दोष सिद्ध नहीं हो पाता, जो न्याय में बड़ी बाधा बनता है। गृह मंत्री ने कहा कि यदि हम पर्याप्त कदम नहीं उठाते, तो साइबर फ्रॉड एक सामान्य अपराध नहीं रह जाता, बल्कि एक राष्ट्रीय संकट बन जाता। ऐसे सभी स्टेकहोल्डर्स-कॉल सेंटरों की पहचान, चाहे वे देश के अंदर हों या बाहर, जागरूकता अभियान, 1930 को प्रभावी बनाना, कॉल अटेंड करने का समय कम करना, बैंक और I4C के बीच बेहतर समन्वय- को ये सभी कार्य एक साथ और तुरंत करने होंगे।
गृह मंत्री ने कहा, हेल्पलाइन 1930 साइबर फ्रॉड से पीड़ितों को बचाने का एक कारगर साधन साबित हुई है। उन्होंने देश भर की सभी पुलिस इकाइयों से अनुरोध किया कि 1930 के कॉल सेंटर पर पर्याप्त संख्या में कॉल हैंडलर तैनात किए जाएं। यदि कई बार रिंग करने के बाद भी पीड़ित का कॉल नहीं उठाया जाता तो तब तक उसका पैसा चला जाता है और 1930 की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न लग जाता है। उन्होंने कहा कि इसी तरह, सभी निजी, सार्वजनिक और सहकार बैंकों को भारत सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा संयुक्त रूप से विकसित म्यूल अकाउंट हंटर सॉफ्टवेयर को तुरंत अपनाना चाहिए। जब तक सभी बैंक अपने खातों को इस सॉफ्टवेयर से पूरी तरह साफ नहीं कर लेते, तब तक उपभोक्ताओं को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करना संभव नहीं होगा।