छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में ताड़मेटला गांव के निकट नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर सीआरपीएफ कोबरा की छह टीमों को भारी नुकसान पहुंचाने की योजना बनाई थी। लंबी दूरी तक बारूदी सुरंग बिछाई गई थी। नक्सलियों की योजना थी कि सीआरपीएफ कोबरा टीमों को पहले बारूदी सुरंग यानी आईईडी विस्फोट कर चोट पहुंचाएंगे और उसके बाद घात लगाकर हमला कर देंगे। नक्सलियों की तैयारी बताती है कि वे कोबरा जवानों के हथियार छीनना चाहते थे, लेकिन 206 वीं कोबरा बटालियन के सहायक कमांडेंट 33 वर्षीय नितिन पी भालेराव और उनके साथियों ने नक्सलियों को अपने इरादों में कामयाब नहीं होने दिया।
सीआरपीएफ के एक बड़े अधिकारी के मुताबिक, हम यह जांच भी कर रहे हैं कि सीआरपीएफ कोबरा का ये ऑपरेशन कहीं लीक तो नहीं हुआ था। इसकी सूचना नक्सलियों तक कैसे पहुंची, जबकि इसे कुछ घंटे पहले ही प्लान किया गया था। इस ऑपरेशन में कोबरा के अलावा 150 वीं बटालियन और डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) व लोकल पुलिस कॉरिडोर प्रोटेक्शन में लगाई गई थी।
सीआरपीएफ के एक अधिकारी ने बताया, इस ऑपरेशन की भनक नक्सलियों को कैसे लगी, ये चिंता की बात है। खैर, इसका पता लगाया जा रहा है। पहले भी कई ऐसे ऑपरेशन रहे हैं, जिनकी तैयारी बहुत अच्छे से की गई थी, लेकिन बीच रास्ते में नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। ऐसे ऑपरेशन में इत्तेफाक की संभावना बहुत कम रहती है। कहीं से ऑपरेशन की डिटेल लीक हो जाए, इस तथ्य को खारिज नहीं किया जा सकता।
कोबरा ने नक्सलियों के घर में घुसकर ललकारा
मिनपा में कैंप लगाना एक बड़ी चुनौती रहा है। वजह, ये इलाका नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। गत 21 मार्च को मिनपा में एक बड़ी मुठभेड़ हुई थी। इसमें डीआरजी के 17 जवान शहीद हुए थे। तीन नक्सली भी मारे गए थे। नक्सली हमले के बाद एके-47 जैसी 15 बदूंकें और जवानों के पास मौजूद वायरलैस उपकरण आदि लूट कर भाग गए थे। डीआरजी के करीब आठ हजार जवान नक्सलियों के इस गढ़ में कैंप लगाने का प्रयास कर चुके हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली। दस साल से वहां कैंप स्थापित करने की कोशिशें चल रही थी। सीआरपीएफ की कोबरा इकाई ने यहां कैंप लगाने के लिए कदम आगे बढ़ाए। कोबरा ने नक्सलियों के इस गढ़ में भीतर घुस कर उन्हें ललकारा। शनिवार रात को ये टीमें उसी कैंप की ओर बढ़ रही थी।
मिनपा की तरफ बढ़ रहे कोबरा दस्ते में कुल छह टीमें बनाई गई थी। डी 206 से तीन टीमें 10, 11 व 12 गठित की गई, जबकि कोबरा 206ए से 1, 2 व 3 टीम बनी थी। कोबरा डी की टीमों की कमान चीता गणेश वलुंज के हाथ में थी, जबकि कोबरा 206ए टीमों की कमान पंथेर रमेश यादव को सौंपी गई। टू आईसी दिनेश कुमार सिंह इस ऑपरेशन को ओवरऑल कमांड कर रहे थे। उनके साथ असिस्टेंट कमांडेंट चीता नितिन भालेराव भी थे। चूंकि उस वक्त रात थी, तो इन्हें बारूदी सुरंग का अंदाजा नहीं था। जिस जगह पर ये विस्फोट हुआ, वहां पहले से इस तरह की कोई संभावना नजर नहीं आई। विस्फोट के बाद दिनेश कुमार सिंह, नितिन भालेराव और सिपाही श्रीराम दूर जाकर गिरे। इसके बावजूद उन्होंने अपने हथियार नहीं छोड़े। विस्फोट के तुरंत बाद नक्सलियों ने घात लगाकर हमला बोल दिया। इसका मतलब नक्सली केवल बारूदी सुरंग के विस्फोट तक सीमित नहीं थे, उन्होंने घायल जवानों पर हमला कर हथियार लूटने की योजना बना रखी थी। उसी के तहत नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। घायल होने के बाद भी इन तीनों ने उनकी फायरिंग का जवाब दिया। उन्हें अपने करीब नहीं आने दिया। कुछ ही देर में वहां दूसरी टीम भी पहुंच गई। उसके बाद नक्सलियों को वहां से खदेड़ दिया गया। इस हमले में नौ जवान घायल हो गए। नितिन भालेराव ने रायपुर के रामकृष्ण अस्पताल में दम तोड़ दिया।
दशकों से सीआरपीएफ एयरविंग की मांग कर रही है, लेकिन नहीं मिला हेलीकॉप्टर ...
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में इस तरह के ऑपरेशन लगातार होते रहते हैं। जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्व में भी आतंकियों के साथ मुठभेड़ होना आम बात हो चली है। सीआरपीएफ में अभी तक कोई एयरविंग नहीं है। बीएसएफ के पास अपनी खुद की एयरविंग है। दशकों से सीआरपीएफ में एयरविंग के लिए आवाज उठाई जा रही है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर की सेवाएं मुहैया कराई गई हैं। सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडरों का कहना है कि शनिवार रात हुए हमले में रात 12 बज कर 10 मिनट पर हेलीकॉप्टर पहुंचा था, जबकि हमला नौ बजे से पहले हो चुका था। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पंवार कहते हैं कि ऐसी स्थिति में अगर बल का अपना हेलीकॉप्टर हो तो घायल जवानों को बचाया जा सकता है। जिस जवान को गोली लगी हो, उसके लिए हर सेकेंड कीमती होता है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ के पास अपने कुछ हेलीकॉप्टर होना बहुत जरूरी है। केंद्र सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।