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त्रिपुरा: भाजपा को हराने के लिए धर्मनिरपेक्ष दलों को साथ लाने पर बातचीत अंतिम चरण में, लेफ्ट पार्टी का दावा

Tue, 27 Dec 2022 01:21 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अगरतला

सार

त्रिपुरा में 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा और इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट और त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने साथ में चुनाव लड़ा था और वर्षों तक राज्य पर शासन करने वाले लेफ्ट फ्रंट को हराया था।
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त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता। - फोटो : Social Media
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विस्तार
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) ने कहा है कि राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए सभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को साथ लाने की पहल पर बातचीत अंतिम चरण में है। लेफ्ट पार्टी के राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी ने मंगलवार को यह दावा किया। हालांकि, उन्होंने त्रिपुरा में बनने वाले इस नए गठबंधन के लिए बातचीत से जुड़ी पार्टियों के नाम का खुलासा नहीं किया। 
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उन्होंने कहा, "इस साझा पहल की जानकारी जल्द ही सामने होंगी। इसका मकसद फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराना रहेगा।" हालांकि, लेफ्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता ने यह भी कहा कि इस पहल को राजनीतिक पक्ष जुटाव नहीं समझा जाना चाहिए।

मतदाताओं के अधिकारों को बचाना लक्ष्य
उन्होंने आगे कहा, "मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए चुनाव में जीत और हार मायने नहीं रखती। हम राज्य में उस लोकतंत्र को कायम रखने के लिए काफी मेहनत कर रहे हैं, जिसे भाजपा के 58 महीने के शासन ने नुकसान पहुंचाया है।" उन्होंने कहा कि पार्टी की प्राथमिकता राज्य में लोकतंत्र को बरकरार रखने और ऐसा माहौल बनाने की है, जहां मतदाता खुलकर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग कर सकें।
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पिछले विधानसभा चुनाव में मिली थी हार
गौरतलब है कि त्रिपुरा में 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा और इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट और त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने साथ में चुनाव लड़ा था और वर्षों तक राज्य पर शासन करने वाले लेफ्ट फ्रंट को हराया था। इस गठबंधन को 60 सदस्यीय विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत मिला था। इसी के साथ इस गठबंधन ने लेफ्ट पार्टी के 25 साल के शासन का खात्मा किया था। भाजपा-आईपीएफटी ने कुल मिलाकर 43 सीटों पर कब्जा जमाया था। भाजपा को इनमें 35 सीटें हासिल हुई थीं, जबकि आईपीएफटी को आठ सीटें मिली थीं। वहीं लेफ्ट पार्टी के विधानसभा में सिर्फ 15 विधायक ही चुनकर पहुंचे थे। कांग्रेस को इस चुनाव में महज एक सीट मिली थी। 
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