पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति को एक नई दिशा देने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। चुनाव के दौरान भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने जिस आक्रामकता के साथ बंगाल जीतने का प्रयास किया, उसे देखकर यह सवाल उठने लगा था, क्या देश में मोदी का विकल्प नहीं बचा है? अब बंगाल के नतीजों ने उस सवाल का जवाब दे दिया है।
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर एवं प्रख्यात राजनीतिक राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आनंद कुमार का कहना है, देश में 'मोदी' का विकल्प मौजूद है। चुनाव के दौरान भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यह कहता रहा कि देश में 'डबल इंजन' की सरकार होने से कई तरह की परेशानियां आती हैं। इसका मतलब था, केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकार होना। दोनों जगह एक ही दल की सरकार होगी तो राजकाज में सहूलियत होगी।
विपक्ष पेश कर सकता है बड़ी चुनौती: प्रो. आनंद कुमार
प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि ममता की भारी जीत ने विपक्ष को यह मौका दे दिया है कि अब डबल इंजन वाली सरकार ही संघीय ढांचे की भावना के अनुरूप आगे का रास्ता तय करेगी। अगले साल होने वाले यूपी व पंजाब के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा दंगल में मोदी के लिए 'विपक्ष' एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
भाजपा ने बंगाल के चुनाव में हर तरह की तरकीब अपनाई थी। इस चुनाव को युद्ध की भांति लड़ा गया। ममता सरकार में कई लोग, जिन्हें दोषी कहा जाता है, भाजपा ने उन्हें नायक बना दिया। यानी नीतिहीनता का उदाहरण पेश कर दिया। भाजपा ने केवल आलोचना पर फोकस किया। नतीजा, यह चुनाव 'शेष भारत बनाम बंगाल की अस्मिता' बन गया। भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। विपक्ष के ध्रुवीकरण का कांग्रेस मॉडल वोटरों को नहीं लुभा सका।
निकटता बढ़ाएंगे क्षेत्रीय दल
अब ममता बनर्जी जैसा चेहरा विपक्ष का नेतृत्व कर सकता है। ममता की जीत से क्षेत्रीय दलों को राजनीतिक ऑक्सीजन मिली है। कोरोनाकाल में पहले ही अनेक राज्य, केंद्र सरकार से खफा हैं। वजह, दवा और वैक्सीन, सब केंद्र के हाथ में है। राज्यों को यह शिकायत रही है कि उनकी कोई सुन नहीं रहा है। केंद्र अपने मनमर्जी के फैसलों को राज्यों पर थोप रहा है। ममता की जीत से अब क्षेत्रीय दल आपस में निकटता बढ़ाएंगे, इस बात की पूरी संभावना नजर आ रही है।
विपक्ष के कई नेताओं ने दी बधाई
ममता की जीत के साथ ही उन्हें बधाई देने वालों तांता लग गया है। गैर एनडीए दलों के नेता खुशी जता रहे हैं। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार, जम्मू कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, एनसीपी प्रमुख शरद पवार और शिवसेना के नेता संजय राउत सहित कई दूसरे नेताओं ने ममता बनर्जी को सोशल मीडिया पर बधाई दी है।
डॉ. आनंद कुमार इसे विपक्ष के लिए एक नया अवसर मानते हैं। चूंकि अभी तक ये सभी दल कांग्रेस पार्टी को यह मौका देते रहे हैं कि वह विपक्ष का नेतृत्व करे, लेकिन कांग्रेस की अंदरुनी कलह उसे इस अवसर से दूर ले गई। अब ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा अवसर है कि वे विपक्ष का नेतृत्व करें। क्षेत्रीय दल, जिन्हें भाजपा ने डबल इंजन का एक हिस्सा करार दिया था, अब उनके पास मौका है कि वे केंद्र को सहकारी संघवाद की भावना के अनुरुप जवाब दें।
यूपी व पंजाब चुनाव में दिखेगा असर
यूपी और पंजाब के चुनाव में ममता की जीत की बानगी देखने को मिलेगी। योगी आदित्यनाथ के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। पश्चिम बंगाल में 70 प्रतिशत हिंदू आबादी है, जबकि मुस्लिम 30 फीसदी हैं। इसके बावजूद भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण को वोटरों ने अस्वीकार कर दिया। चूंकि यूपी के लिए मोदी शाह की पहली पसंद योगी नहीं हैं, इसे लेकर पार्टी में लगातार अंदरुनी उठापटक होती रहती है। अगले साल होने वाले चुनाव में अगर विपक्ष मिलकर लड़ता है तो भाजपा की राह बहुत मुश्किल हो जाएगी।
कांग्रेस को भी सोचना होगा
दूसरे राज्यों में भी ममता की जीत का असर देखने को मिलेगा। कांग्रेस पार्टी के लिए भी यह सोचने का वक्त है। उन्हें यूपीए में ममता को एक सम्मान का ओहदा दे देना चाहिए। अगर कांग्रेस ऐसा नहीं करती है तो भी ममता की हैसियत इतनी हो गई है कि वह अपने दम पर राज्यों को साथ लेकर मोदी को टक्कर दे सकती हैं।