क्या इससे कोरोना भाग जाएगा। दरअसल, इस मुहिम के जरिए प्रधानमंत्री मोदी और विभिन्न एजेंसियां यह जानने का प्रयास कर रही थीं कि कोरोना से लड़ने के लिए लोग कितने सचेत और जागरूक हैं , साथ ही उनकी प्रतिबद्धता का स्तर कितना है। इसका राजनीतिक कारण भी हो सकता है, लेकिन बड़ा एजेंडा कई दिनों तक लॉक डाउन की स्थिति में जनता के स्वेच्छापूर्वक किए जाने वाले सहयोग को समझना था।
केंद्र सरकार के सूत्रों का कहना है कि पिछले एक सप्ताह से कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर जो रिपोर्ट मिल रही थीं, वह ज्यादा अच्छी नहीं थीं। यही वजह रही कि पीएम मोदी को खुद फ्रंटफुट पर आना पड़ा। संक्रमण तेजी से बढ़ता जा रहा था, महज सात-आठ दिन में कोरोना वायरस के मामलों की संख्या 415 के पार पहुंच गई। ऐसे में सरकार को लॉक डाउन ही बेहतर विकल्प नजर आया।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय को सूचित कर दिया था कि यह महामारी अभी शुरुआती दौर में है। उस वक्त देश में मुश्किल से 50-60 ऐसी लैब थीं जहां पर कोरोना का टेस्ट हो सकता था। हालांकि बाद में आईसीएमआर ने प्राइवेट लैब को भी यह टेस्ट करने के लिए अधिकृत कर दिया। देश में क्वारंटीन सेंटर की संख्या भी अप्रर्याप्त है। खासतौर पर दिल्ली एनसीआर में ज्यादा जगहों पर क्वारंटीन की सुविधा नहीं है।
अभी तक मानेसर में आर्मी परिसर और छावला में आईटीबीपी सेंटर पर ही यह सुविधा मुहैया कराई जा रही है। पिछले सप्ताह कुछ निजी होटल और दूसरे संस्थान भी इस मुहिम में आगे आए, लेकिन ये सब भी नाकाफी हैं। छावला और मानेसर में अभी तक जितने भी लोगों को क्वारंटीन किया गया है, वे सभी विदेश से आए हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय के सह सचिव लव अग्रवाल का कहना है कि लोगों की सतर्कता ही कोरोना से बचाव में सफलता दिलाएगी। सरकार अपने स्तर पर तमाम प्रयास कर रही है, लेकिन कोरोना जिस तरह फैल रहा है, उसमें जनता का सहयोग ही सबसे अहम है। इसके बिना कुछ नहीं हो सकता। लोग जब इन बातों को समझ लेंगे तभी कोरोना को हराया जा सकता है।
गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने भी कुछ ऐसी ही बात दोहराई। उनकी भी यही दलील थी कि हर व्यक्ति के पीछे पुलिस नहीं खड़ी की जा सकती। शुरू में सुरक्षा बलों की तैनाती मामले को बिगाड़ सकती है। इन सब बातों पर गौर करने के बाद ही पीएम मोदी ने पहले देश को संबोधित किया और फिर रविवार को जनता कर्फ्यू का एलान कर दिया।
जनता कर्फ्यू के दौरान और उसके बाद मोदी अपने टवीट् के जरिए लोगों के साथ जुड़े रहे। लोगों को समझाते रहे और जरूरी दिशा निर्देश भी देते रहे। आईबी से भी विभिन्न इलाकों की रिपोर्ट ली गई। किसी भी राज्य में जनता कर्फ्यू को लेकर लोगों का असहयोग जैसा कुछ नजर नहीं आया।
यहीं से सरकार को लोगों की सतर्कता, सहयोग उनकी प्रतिबद्धता का स्तर पता चल गया। नतीजा, सरकार अब कई तरह के मुश्किल फैसले लेने के लिए तैयार हो गई। जैसे ही ताली, थाली और शंख की गूंज खत्म हुई, सरकार के फैसले एक-एक कर लोगों के सामने आने लगे। अस्सी शहरों में लॉक डाउन और विभिन्न राज्यों में कोरोना से बचाव की एडवाइजरी जारी होने लगी।