आपके अनुसार भारत को अब किस रणनीति पर काम करना चाहिए?
हम सभी को बहुत ही अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। हम सभी को एक नये सिरे से जीवन जीने की आदत डालनी होगी। हमें समूहों के बीच जाने से बचना चाहिए। व्यक्तिगत रूप से मीटिंग करने की जगह अब भी हमें ऑनलाइन या वर्चुअल मीटिंग ही करनी चाहिए। सभी गैर-जरूरी यात्राओं को फिलहाल टाल देना चाहिए। इन छोटे लेकिन बेहद जरूरी उपायों से हम संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। बड़े मॉल और भीड़भाड़ वाली जगह से शॉपिंग करने की जगह हम पड़ोस की दुकान से खरीदारी कर सकते हैं, जहां औसतन कम लोगों का आना-जाना हो। इससे हम संक्रमित होने के जोखिम को कम कर सकते हैं।
यदि कोई वैक्सीन लेने का पात्र है तो उसे वैक्सीन जरूर लेनी चाहिए, वैक्सीन लेने से किसी भी तरह के खतरे की बात नहीं है, वैक्सीन सुरक्षित और प्रभावी है। वैक्सीन न लेने के खतरों के मुकाबले वैक्सीन से होने वाले दुष्प्रभाव काफी मामूली हैं, जिन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है। इसके साथ हमें हमारी सामाजिक सहभागिता को भी ध्यान में रखना है, यदि हम खुद को संक्रमण से सुरक्षित रखते हैं जो हम अपने समुदाय में भी संक्रमण के खतरे को कम कर सकते हैं। महामारी के समय बहुत से लोगों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है, हमें ऐसे जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए भी अपने हाथ बढ़ाने चाहिए।
कोरोना संक्रमण से अब कुछ मरीजों में डायरिया और कंजेक्टिवाइटिस की शिकायत भी देखी जा रही है, कोरोना वायरस का प्रभाव लोगों अलग-अलग क्यों दिखाई देता है?
सभी तरह की बीमारियों का असर अलग-अलग तरह के लोगों में भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, उदाहरण के लिए खसरा, चिकन पॉक्स, डायबिटीज और यहां तक की मस्तिष्काघात में भी, अभी हम कुछ ही वायरस के इस तरह के बायोलॉजी आधारित प्रभाव को समझ पाए हैं। इसकी अहम वजह जो कोरोना वायरस के संदर्भ में हमने देखी वह है उम्र का प्रभाव। बुजुर्ग व्यक्तियों पर वायरस का प्रभाव अधिक गंभीर असर छोड़ता है जबकि कम उम्र के युवाओं में इसके अधिक गंभीर प्रभाव नहीं देखे गए।
यह भी सत्य है कि महामारी के शुरुआती समय से ही कोरोना पॉजिटिव कुछ मरीजों में डायरिया के लक्षण देखे गए थे। यहीं नहीं चीन ने जब कोरोना संक्रमण बढ़ने के शुरुआती समय में बीमारी की जानकारी दी थी, उसमें कोरोना संक्रमित पांच से दस फीसदी लोगों में डायरिया होने की बात कही गई थी। कोरोना में आंखों का संक्रमण या कंजेक्टिवाइटिस का बहुत मामूली प्रभाव देखा जाता है। यह प्रभाव इतने कम होते हैं कि इन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि यह गंभीर नहीं होते।
कोरोना पॉजिटिव मरीजों के इलाज संबधी आपके क्या अनुभव रहे और इस दौरान आपके संस्थान को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
कोविड काल में काम करने की सबसे अहम चुनौती यह थी कि खतरे को देखते हुए हमें तुरंत कई तरह के संक्रमण नियंत्रण संसाधनों के साथ काम करना था। जैसे कि शुरुआत में पीपीई किट पहनना और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, ग्लब्स, सर्जिकल लेंस, शू आदि के साथ काम करना आसान नहीं था। बाद में हमें इसकी आदत हो गई। बीमारी ने हमारे सभी स्टॉफ को एकजुट कर दिया, सभी के अवकाश रद्द कर दिए गए, डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिकल स्टॉफ और तकनीशियन सभी ने हर तरह का काम किया।
ऐसा अधिकतर कम होता है कि एक सर्जन को आप वेंटिलेटर से जुड़ी व्यवस्था को सही करते हुए देखे, लेकिन ऐसा किया गया, जबकि सामान्य दिनों में सर्जन केवल सर्जरी करने के लिए ही ओटी में जाते हैं। सीनियर डॉक्टर, विभागाध्यक्ष और बाकी सभी मेडिकल स्टॉफ अस्पताल में दिन-रात काम करते रहे यह देखने के लिए कि सभी कुछ व्यवस्थित रहे। मैं यह कहना चाहूंगा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में संस्थान के सभी लोग एकजुट हो गए। यह हमारे लिए वास्तव में बहुत ही गर्व का भी समय है जबकि महामारी से देश को बचाने के लिए संस्थान और स्टॉफ बेहतर काम कर रहा है।