फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Coronavirus: लॉकडाउन के चलते गुरुवार को नहीं मना CRPF का 'शौर्य दिवस'

Thu, 09 Apr 2020 03:16 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • 1965 में सीआरपीएफ के छोटे से दस्ते ने पाकिस्तानी इन्फेंट्री को मुंहतोड़ जवाब दिया था
  • पाकिस्तानी सेना की 51वीं ब्रिगेड के 3,500 सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर किया
विज्ञापन
CRPF Commondos - फोटो : Social Media (File)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कोरोना के चलते सीआरपीएफ ने इस बार 9 अप्रैल को शौर्य दिवस नहीं मनाया। सीआरपीएफ के अदम्य शौर्य, रण कौशल और अद्वितीय बहादुरी के चलते हर साल 9 अप्रैल को शौर्य दिवस मनाया जाता है।

विज्ञापन

इस दफा भी बड़े पैमाने पर यह दिवस मनाने की तैयारियां की गई थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस कार्यक्रम में शिरकत करनी थी, लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते शौर्य दिवस पर आयोजित सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए।
 
सीआरपीएफ, जिसे देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल होने का गौरव हासिल है, उसकी बहादुरी के किस्से भी उतने ही ज्यादा हैं। 1965 में इस बल की छोटी सी टुकड़ी ने पाकिस्तान की इन्फेंट्री, जिसने गुजरात स्थित कच्छ के रण में 'टाक' और 'सरदार पोस्ट' पर हमला किया, को मुंह तोड़ जवाब दिया था।
विज्ञापन


दुनिया हैरान थी कि अर्धसैनिक बल की दो बटालियनों (करीब 150 जवान) ने पाकिस्तानी सेना की 51वीं ब्रिगेड के 3,500 सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। पाकिस्तान ने 14 घंटे में तीन बार हमले का प्रयास किया, लेकिन सीआरपीएफ के बहादुरों ने उनके मंसूबे पूरे नहीं होने दिए।

पाकिस्तान के पास तोपें भी थीं, जबकि सीआरपीएफ जवानों के पास सामान्य हथियार थे। नतीजा, पाकिस्तान के 34 सैनिक मारे गए, जिनमें दो अफसर भी शामिल थे। चार को जिंदा पकड़ लिया गया।

शौर्य का इतिहास

बता दें कि 1965 में जब पाकिस्तान ने यह हमला किया, तो उस वक्त बीएसएफ की स्थापना नहीं हुई थी। अप्रैल 1965 में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा की एक सैनिक चौकी पर हमला करने की योजना बनाई।

पाकिस्तानी सेना का मकसद भारतीय भू-भाग पर कब्जा करना था। इसके लिए उन्होंने ऑपरेशन डेजर्ट हॉक शुरू किया था। 9 अप्रैल, 1965 की सुबह 3 बजे पाकिस्तान की 51 ब्रिगेड ने अपने 3500 सैनिकों के साथ रण ऑफ कच्छ की 'टाक' और 'सरदार पोस्ट' पर हमला कर दिया।

उस दौरान सीआरपीएफ और गुजरात राज्य पुलिस फोर्स को यहां पर तैनात किया गया था।
 

सीआरपीएफ की दूसरी बटालियन की चार कंपनियां इस इलाके में सीमा पर तैनात थीं। पाकिस्तान की एक पूरी इंफेन्ट्री ब्रिगेड ने सरदार व टॉक चौकियों पर हमला कर दिया था। करीब 14 घंटे तक यह भीषण समर चलता रहा।

सीआरपीएफ के जवानों ने विशाल ब्रिगेड का डट कर मुकाबला किया और उसे सीमा से वापस खदेड़ दिया। इस युद्ध में सीआरपीएफ के 6 जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी और इतिहास में अमर हो गए।
 

यह दुनिया के इतिहास में हुए अनेक युद्धों में से एकमात्र ऐसा युद्ध था, जिसमें पुलिसबल की एक छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन की विशाल ब्रिगेड को घुटने टेक वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। सीआरपीएफ के जवानों की इस बहादुरी को हमेशा याद करने के लिए 9 अप्रैल का दिन शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।

 

विज्ञापन

 

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें