मरीजों का इलाज कर रहे चिकित्सक व पैरा मेडिकल स्टाफ को संक्रमण से बचाने के लिए जैव विज्ञान व जैव इंजीनियरिंग विभाग (डीबीबी) और आईआईटी बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने ऐसे जैल के विकास पर काम शुरू किया है, जिसे नाक की नली में लगा कर वायरस को रोका जा सकेगा। जैल बनाने में सफलता मिली तो सामुदायिक स्तर पर भी वायरस को फैलने से रोका जा सकेगा। इस शोध में नौ महीने लगने की संभावना है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाला विज्ञान एवं इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (एसईआरबी) यह अध्ययन करवा रहा है। पहले चरण में ऐसी मेजबान कोशिकाओं को निष्क्रिय करने पर काम हो रहा है, जिन्हें यह वायरस हमारे शरीर में दाखिल होने के बाद प्रतिकृति बनाने में उपयोग करता है।
वायरस यह प्रक्रिया फेफड़ों में अंजाम देता है और फिर बाकी अंगों में फैलता है। दूसरे चरण में ऐसे जैविक अणु उपयोग करने का प्रयास हो रहा है जो वायरस को उसी प्रकार पकड़ कर निष्क्रिय कर सकें, जैसे डिटर्जेंट करते हैं। विभाग के सचिव आशुतोष शर्मा ने बताया कि दूसरा चरण पूरा होने पर नासिका-जैल बनाना संभव हो सकेगा।
कोरोना की चपेट में 80 फीसदी लोग उन लोगों की वजह से आते हैं जिन्हें खुद में वायरस के होने का लक्षण पता ही नहीं होता। शंघाई स्थित जियाओ टॉन्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोध में वैज्ञानिकों को ये भी पता चला है कि औसतन 3.8 दिन में एक व्यक्ति दूसरे को संक्रमित करता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि वायरस को जड़ से खत्म करने के लिए आइसोलेशन के साथ बड़े पैमाने पर जांच की जरूरत है जिससे वायरस को पकड़ा जा सके जो लोगों में तो है लेकिन उनको इसका अहसास नहीं होता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि जब तक पहले संक्रमित की पहचान होती है तब तक दूसरा व्यक्ति उससे संक्रमित हो चुका होता है। वुहान के मरीजों पर हुए अध्ययन में पता चला है कि अधिकतर ऐसे लोगों से संक्रमित हुए जो पूरी तरह स्वस्थ दिख रहे थे लेकिन संक्रमित थे। एजेंसी