लापरवाही: दिल्ली में अशोक रोड पर फेंका गया मास्क।
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मुंबई में एक डॉक्टर को खांसी हुई, फिर बुखार आया। कोरोना वायरस संक्रमण का संदेह हुआ, तो उन्होंने बीएमसी के कस्तूरबा अस्पताल की प्रयोगशाला में जांच करवाई। इसकी रिपोर्ट निगेटिव आई, यानी उन्हें संक्रमण नहीं था। उन्होंने राहत की सांस ली लेकिन लक्षण बने रहे, इसलिए दो दिन बाद ही फिर जांच करवाई। इस बार रिपोर्ट पॉजिटिव आई, यानी वे संक्रमित हो चुके थे। ऐसे कई मामले देश के पुणे, नोएडा, जैसे शहरों में सामने आ रहे हैं।
इनकी वजह से कोविड-19 के मरीजों को लेकर चिकित्सकों में चिंताएं बढ़ गई हैं। अधिकतर एकमत हैं कि कोरोना वायरस के पहले टेस्ट में ही शरीर में मौजूद रहते हुए भी पकड़ में न आ पाने की वजह से ऐसा हो रहा है। यह मामले चिकित्सा विज्ञान में ‘फॉल्स निगेटिव’ कहलाते हैं। किसी भी व्यक्ति को पूरी तरह निगेटिव या पॉजिटिव घोषित करने के लिए 24 घंटे के अंतराल पर हुई दो-जांच में एक जैसे परिणामों को पुख्ता माना जा रहा है।
हाईरिस्क ग्रुप की जांच में खास सावधानी बरतें
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केवल निगेटिव टेस्ट रिपोर्ट के मायने यह नहीं निकालें कि व्यक्ति में संक्रमण नहीं है। व्यक्ति में अगर लक्षण मिल रहे हैं तो पुख्ता जांच जरूरी हो जाती है। खासतौर से ऐसे लोग जिन्हें हाईरिस्क श्रेणी में रखा गया है, वे अधिक उम्र के हैं, डायबिटीज, हाइपर टेंशन, किडनी या हृदय रोग से ग्रस्त हैं तो उनके मामले में विशेष सावधानी बरतनी होगी।