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निर्भया जैसे कांड के बावजूद दुष्कर्म के मामलों में सजा की दर महज 27 फीसदी

Thu, 09 Jan 2020 08:31 PM IST
Trainee Trainee न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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तमाम सख्त कानूनों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। उस पर दुष्कर्म के मामले में सजा होने की धीमी रफ्तार समस्या को और गंभीर कर रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में दुष्कर्म के मामले तो बढ़ रहे हैं लेकिन ऐसे मामलों में सजा की दर घट रही है।

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एनसीआरबी की रिपोर्ट

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, धारा 376 के मामले 2018 में 33,356 मामले दर्ज हुए। अदालत में 1,56,327 दुष्कर्म के मुकदमे चल रहे थे। इनमें से 17,313 मामलों में सुनवाई हुई। इसमें केवल 4,708 वादों में आरोपियों पर दोष साबित हुए। 11,133 मामलों में आरोपी कार्यवाही पूरी होने के बाद बरी हुए। जबकि 1,472 मामलों का निर्वाहन हुआ यानि आरोपी  शुरुआती दौर में ही आरोपमुक्त हो गए।  

इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुष्कर्म के मामले में सजा की दर केवल 27.2 फीसदी है। कानून विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी वजह व्यवस्था की लचर प्रक्रिया है। अदालतों में 2018 में दुष्कर्म के 1,38,642 वाद लंबित थे। अगर इसकी तुलना 2017 से की जाए तो एनसीआरबी के आकड़ों के मुताबिक कुल 32,550 दुष्कर्म के मामले पुलिस के समक्ष दर्ज हुए। इसी साल दुष्कर्म के 5,822 वाद अदालतों में लंबित थे। इनमें से 18,019 मामलों में सजा हुई। यानि 32.2 फीसदी आरोपियों को सजा हुई।
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जबकि 2018 में केवल 27.2 फीसदी को सजा हुई, इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि तमाम कड़े कानूनों के बावजूद दुष्कर्म मामलों में सजा का प्रतिशत लगातार घट रहा है। जबकि 2012 दिसंबर में हुए निर्भया कांड के बाद से लगातार महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए खासतौर पर दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों में सजा के प्रवाधान लगातार कड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता ऋचा पांडे के मुताबिक सख्त कानून के साथ उसके पालन करने के नियमों को भी तेजी से लागू करना होगा। कोई केस जांच और सबूतों की उपलब्धता के आधार पर अदालत पहुंचता है। तब सुनवाई शुरू होती है। देश की अदालतों पर और भी काम का बोझ है। उस पर दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामले।  

ऋचा कहती हैं- केंद्र ने ऐसे मामलों के लिए एक हजार से ज्यादा विशेष कोर्ट खोलने का प्रावधान किया हुआ है। लेकिन ये अदालतें केसों की संख्या के मद्देनजर नाकाफी हैं। साथ ही केवल कोर्ट बनाने से काम नहीं चलेगा। ऐसे मामलों में समग्रता से काम करना होगा। इसके अलावा दुष्कर्म जैसे मामलों में पुलिस और आम जनता को भी संवेदनशील बनाना होगा। ज्यादातर केसों में देखने को मिलता है कि न्यायिक प्रक्रिया के प्रति जागरुकता का अभाव है। दुष्कर्म कानूनों की कितनी जानकारी पुलिसकर्मियों को है? कितने राज्यों में दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामलों को लेकर पुलिस को विशेष परीक्षण दिया जा रहा है और वह स्वयं ही ऐसे मामलों के प्रति कितनी संवेदनशीलता के साथ सजग हैं? 

उन्होंने कहा कि निर्भया जैसे बड़े मामले में सात साल के बाद फैसला आया। आरोपी न्यायिक प्रक्रिया में दांवपेंच करके मामले को लंबा खींचते रहे। पुलिस और प्रशासन की पैरवी में बहुत सजगता के बावजूद कोर्ट दर कोर्ट मामला चलता रहा। आखिर में अब आरोपियों के लिए फांसी मुकर्रर हो गई है। लेकिन सवाल वही कि इतनी देर क्यों? तो इसका जवाब है सख्त कानूनों के साथ पैरवी और सिस्टम को भी दुरुस्त करना होगा। दुष्कर्म के मामलों में समयसीमा तय करनी होगी, तभी दुष्कर्म के मामलों के आरोपियों को सजा मिल सकेगी।    

महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भी इजाफा

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भी इजाफा हुआ है। इसमें 27.9 फीसदी मामलों को महिला के पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा अंजाम दिया गया है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आकड़ों पर निगाह डालें तो 2018 में 3,78,277 मामले दर्ज हुए। इनकी संख्या 2017 में 3,59,849 और 2016 में 3,38,954 थी।  इससे साफ जाहिर है कि समाज में तमाम कवायद के बावजूद महिलाओं के प्रति हिंसा की घटनाएं 2016 के मुकाबले तो घटी हैं लेकिन 2017 के मुकाबले खासी बढ़ी हैं।  

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