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Karnataka : सावरकर पर निबंध को लेकर विवाद, लेखक की पत्नी ने कहा- ‘बुलबल‘ का जिक्र रूपक बतौर

Thu, 08 Sep 2022 01:27 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु

सार

वीर सावरकर को सेलुलर जेल की जिस कोठरी में बंद किया गया था उसका वर्णन करते हुए निबंध में लिखा है कि ‘सावरकर की कोठरी में एक सुराख तक नहीं है, फिर भी किसी तरह बुलबुल उसके अंदर उड़ते हुए आती थी और उसके पंखों पर बैठकर सावरकर रोज अपनी मातृभूमि की यात्रा कर जेल लौट जाते थे।‘
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वीर सावरकर - फोटो : SAVARKARSMARAK.COM
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विस्तार
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हिंदुत्व के विचारक विनायक दामोदर सावरकर पर कर्नाटक की कक्षा आठवीं की एक पाठ्य पुस्तक में निबंध को लेकर विवाद पैदा हो गया है। इस पुस्तक में सावरकर को लेकर एक पैराग्राफ है। उसमें ‘बुलबुल‘ का जिक्र है। विवाद पैदा होने पर लेखक की पत्नी ने कहा कि इस शब्द का इस्तेमाल एक रूपक के तौर पर किया गया है।

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पुस्तक में कन्नड़ के लेखक केटी गट्टी द्वारा लिखा एक यात्रा वृत्तांत ‘कलावन्नु गेद्दावरु‘ शामिल है। यह निबंध उन्होंने अंडमान की सेलुलर जेल भ्रमण को लेकर अपने अनुभव लिखे हैं। इसी जेल में सावरकर को रखा गया था। लेखक गट्टी 1911 से 1924 के बीच सेल्युलर जेल गए थे, जहां उस वक्त सावरकर बंद थे।

वीर सावरकर को सेलुलर जेल की जिस कोठरी में बंद किया गया था उसका वर्णन करते हुए निबंध में लिखा है कि ‘सावरकर की कोठरी में एक सुराख तक नहीं है, फिर भी किसी तरह बुलबुल उसके अंदर उड़ते हुए आती थी और उसके पंखों पर बैठकर सावरकर रोज अपनी मातृभूमि की यात्रा कर जेल लौट जाते थे।‘ पाठ्यपुस्तक के निबंध का यह पैराग्राफ सोशल मीडिया में वायरल हो गया। इसके बाद विवाद शुरू हो गया। 
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यात्रा पर आधारित निबंध के इस अंश की सोशल मीडिया यूजर्स आलोचना कर रहे हैं। उनका आरोप है कि यात्रा वृत्तांत में सावरकर व  कर्नाटक सरकार का मजाक उड़ाया गया है। निबंध को लेकर विवाद के बीच गट्टी की पत्नी यशोदा अम्मेमबाला ने बयान जारी कर सफाई दी है।

यशोदा ने कहा कि बीमार होने के कारण  उनके पति स्पष्टीकरण देने की हालत में नहीं हैं। वे उनकी तरफ से तो बात नहीं कर सकतीं, लेकिन कुछ प्रासंगिक ब्योरे साझा कर सकती हैं। उन्होंने कहा, ‘बुलबुल की कल्पना को लेकर उठे विवाद को देखते हुए यह स्वतः प्रमाणित है कि यह एक रूपक से ज्यादा कुछ नहीं है। यह भ्रम पैराग्राफ में संदर्भ प्रसंग को ध्यान से नहीं समझने के कारण पैदा हुआ है। हो सकता है कि यह लेखक की गलती से हुआ हो अथवा संपादन की त्रुटि भी हो सकती है। 

सेलुलर जेल के आसपास बुलबुलों को डेरा था
सूत्रों का कहना है कि अंडमान की उक्त जेल के आसपा बुलबुल बहुत थीं और अंडमान जेल में जीवन का अहम हिस्सा थीं। उन्होंने साथ ही कहा कि स्थानीय कथाओं में इस बात का जिक्र है कि सावरकर को बुलबुल पसंद थीं और सावरकर की आत्मकथा में भी इस तथ्य का जिक्र है। कुछ अन्य सूत्रों ने भी इसकी पुष्टि की है। 

यह भाषा की पुस्तक, इतिहास की नहीं
यशोदा ने कहा, ‘हमें नहीं पता कि सावरकर का बुलबुल के पंख पर बैठने का रूपक लेखक ने खुद लिखा है या यह कोई कहानी है, जिसे उन्होंने किसी किताब या स्थानीय सूत्रों से लिया है। लेकिन हम इतना तो विश्वास से कह सकते हैं कि यह लेखक की कल्पना नहीं है।  याद रखिए कि यह भाषा से जुड़ा पाठ्यक्रम है, इतिहास का नहीं। यात्रा वृतांत होने के नाते इसे एेतिहासिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

ट्विटर यूजर्स ने उड़ाई हंसी
इस निबंध को लेकर विवाद के बाद कुछ ट्विटर यूजर्स ने पैराग्राफ में कही गई बातों का मजाक उड़ाया है। उन्होंने एक पक्षी पर बैठे सावरकर व्यंग्यात्मक तस्वीरें भी ट्वीट की हैं, जबकि एक वर्ग ने इसे राजनीतिक प्रचार का सबसे घटिया रूप बताया है। 

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