उबर के खिलाफ उपभोक्ता पैनल से महिला की शिकायत खारिज
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जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, मध्य मुंबई ने मंगलवार को पारित एक आदेश में कहा कि भारत में सार्वजनिक वाहनों में पालतू जानवरों के परिवहन के संबंध में कोई कानून या कानूनी प्रावधान नहीं है। जून 2022 में दायर अपनी शिकायत में, वडाला निवासी महिला ने कहा कि कंपनी की पालतू-मित्रतापूर्ण नीतियों के बावजूद, उसे दो मौकों पर उबर ड्राइवरों की तरफ से सवारी देने से मना कर दिया गया, जब उसने उन्हें बताया कि उसका पालतू कुत्ता उसके साथ यात्रा करेगा।
महिला ने मांगा था 10 लाख रुपये मुआवजा
इस मामले में महिला ने सेवा में कमी, अनुचित व्यापार व्यवहार, मानसिक पीड़ा और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 10 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। उसने आयोग से कंपनी को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया कि वह यात्रियों को कैब में पालतू जानवरों और आवारा जानवरों के साथ यात्रा करने की अनुमति देने के लिए उपाय करें।
पालतू जानवरों के सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने की नीति
वहीं उबर इंडिया ने बताया कि शिकायतकर्ता ने उन ड्राइवरों को मामले में पक्षकार नहीं बनाया - जिनके खिलाफ महिला ने शिकायत की थी। उसने कहा कि उसके आरोपों को साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है, सिवाय इसके कि उसने ड्राइवरों को पालतू कुत्ते के साथ यात्रा करने के बारे में बताया था। कंपनी ने कहा कि भारत में पालतू जानवरों को सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने की अनुमति देने के बारे में कोई नीति नहीं है, और शिकायत को खारिज करने की मांग की।
उबर इंडिया को दोषी नहीं ठहराया जा सकता- आयोग
कंपनी के व्यवसाय मॉडल की समीक्षा करने के बाद आयोग ने पाया कि ड्राइवरों ने अपने विवेक से यात्रा रद्द की, और इसके लिए उबर इंडिया को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आयोग ने कहा इसके अलावा, ऐसा कोई सबूत नहीं है जो दर्शाता हो कि शिकायतकर्ता ने ड्राइवर को सूचित किया था कि उनके साथ एक पालतू जानवर होगा, न ही भारत में सार्वजनिक वाहनों में पालतू जानवरों के परिवहन के बारे में कोई स्थापित कानून या प्रावधान है। आयोग ने कहा कि महिला ने यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया कि पालतू जानवरों से संबंधित नीतियां, जो अन्य देशों में लागू हो सकती हैं जहां उबर संचालित होता है, भारत में भी कंपनी पर बाध्यकारी हैं।
लेकिन उसने नोट किया कि पालतू जानवरों के अनुकूल वातावरण की आवश्यकता के बारे में उसकी चिंताओं को स्वीकार किया जाता है और ऐसा लगता है कि इसे सद्भावना और आवश्यक रूप से बनाया गया है। आयोग ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा, इस मामले पर किसी बाध्यकारी समझौते, विशिष्ट कानूनी प्रावधानों या स्थापित नियमों का अभाव हमें अनुरोध के अनुसार राहत प्रदान करने से रोकता है।