इससे पहले साल 2017 में सोसाइटी ने लेस्बियन, गे, बाय सेक्सुएल और ट्रांसजेंडर के लिए एक टास्क फोर्स भी गठित की थी। इस टास्क फोर्स को अब आंशिक रूप से दोबारा गठित किया गया है, यह आज भी समलैंगिकता का समर्थन कर अपना कार्य कर रही है। सोसाइटी का मानना है कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है और ना ही अपराध है।
सोसाइटी ने यह भी कहा कि अमेरिकन साइकेट्रिक असोसिएशन और इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीज इन द वर्ल्ड समलैंगिकता को साल 1973 और 1992 में मानसिक विकार की लिस्ट से हटा चुके हैं। बता दें भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। आईपीसी की धारा 377 के तहत यदि 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाते हैं और बाद में दोषी पाए जातें हैं तो उन्हें 10 की कैद से लोकर उम्र कैद तक की सजा हो सकती है।
समलैंगिकता की याचिका पर पांच सदस्यों की पीठ सुनवाई करेगी। यह सुनवाई सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में की जाएगी। जिसमें जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, डी वाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा भी शामिल हैं।